मुक्तक
हमने जिसको अपना समझा, विश्वास जताया,
लूट रहे अपनों को अपने, देख कर मन घबराया।
जिन लोगों से बात करी थी, सबसे धोखा खाया,
सोच रहा हूँ जगत स्वार्थी, क्या खोया क्या पाया?
हमने जिसको अपना समझा, आस्तीन के साँप थे,
घर के भीतर पलने वाले, कुछ से रिश्ते ख़ास थे।
माली को दोष दें कैसा, उस पर भी तो बंदिश थी,
घर वाले ही उनके रक्षक थे, जो ज़हरीले नाग थे।
हमने जिसको अपना समझा, गलती बिसरा जाते हैं,
रिश्तों का रिश्ता रह जाये, हम ही थोड़ा झुक जाते हैं।
वो महत्व रिश्तों का समझें, कोशिश अपनी यही रही,
बिना किसी गलती के भी, हम ही थोड़ा नम जाते हैं।
हमने जिसको अपना समझा, अक्सर धोखेबाज़ मिले,
दुश्मन को जब गले लगाया, निज पीठ पर घात मिले।
नादां थे हम सारे जग को, मानवता की बात बताते,
दानव को नैतिकता की बातें, दानव से प्रतिघात मिले।
— डॉ अ कीर्तिवर्द्धन
