कविता

कोई नहीं करेगा हिमाकत

आसमां की ओर हाथ उठा
अपूर्ण चाह रखने वालों,
न हो पाएगा किसी
सैद्धांतिक विचारों पर चलना आपसे,
क्योंकि आपको बहुत ज्यादा डर है
अनजाने अनदेखे पुण्य-पाप से,
कई आए धरती पर और चले गए,
आपकी व्यवहार बुद्धि से छले गए,
हर हकीकत वो दिखलाना चाहा,
चलना कैसे सिखलाना चाहा,
ऊंची गर्दन को किये किये
ऊपर ऊपर ही बस देख पाया,
जब जागना और जगाना था खुद को
सद्विचारों को क्यों न समेट पाया,
कह कह कर सारे थक ही गए
नहीं कुछ करेगा कोई ऊपरवाला,
जो कुछ भी होना है यहीं से ही
नहीं खुल सकता बैठे किस्मत का ताला,
जब तक न एक हो पाओगे
मानसिकता को गिरवी रखने वालों,
तब तक खदेड़े जाते ही रहोगे
जूठन की खिचड़ी को चखने वालों,
पहले भी संभव था और आज भी है
रहेगा संभव भविष्य में सत्ता पाना,
बैठोगे कुर्सी पर बनकर ताकतवर
कैसे होगा हिम्मत तुम सबको सताना,
साहस कर एक बार जुटकर तो देखो
है सत्ता में देखो कितना ताकत,
हर दुख आफत को यही हरेगा
आंख उठाने की कोई नहीं करेगा हिमाकत।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554