गीत/नवगीत

मानवता का धर्म निभाना

जिसने मानवता बिसरादी,वह हैवान कहाता है।
मानवता का धर्म निभाना,ही ईमान कहाता है।

नित तकरार मचाते रहना , छोटी छोटी बातों पर,
कटुता क्लेश बढ़ाते रहना, बेमतलब बुनियादो पर,
दुख देखे जो द्रवित न होता, वह पाषाण कहाता है।
मानवता का धर्म निभाना…….

क्षण भंगुर जीवन मानव का,पता नहीं कल क्या होगा,
कितनी सांसे हमें मिली हैं, इसका ज्ञान कहाँ होगा,
घन घमंड में चूर हुआ नर,वह शैतान कहाता है।
मानवता का धर्म निभाना……..

दूषित मन विचार औ वाणी,घर में कलह कराते हैं,
भाई भाई का दुश्मन है, बिखरे सारे नाते हैं,
तरस रहे मां बाप प्यार को,दुख गहराता जाता है।
मानवता का धर्म निभाना…….

भ्रात भ्रात के बीच खड़ी है नफरत की दीवारें अब,
आस पड़ोसी संबंधी भी, अपने में खुश रहते अब,
खुशियाँ सिमटी मोबाइल में यह अज्ञान कहाता है।
मानवता का धर्म निभाना……….

धर्म सनातन सिखा रहा है उत्तमता को ग्रहण करो,
जीवित यदि रहना चाहो तो, सत्य धर्म अनुसरण करो,
नर तन को पवित्र जो रखता, वह ही मनुज कहाता है।
मानवता का धर्म निभाना……..
— मंजूषा श्रीवास्तव “मृदुल”

*मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016