कहानी . बच्चों की परवरिश
सुधीर बैंगलोर में एक आई. टी. कम्पनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्य करता है। इस कारण वह अपने माता-पिता से दूर अपनी पत्नी शालिनी एवं एकमात्र संतान सौरभ के साथ रहता है। सौरभ की उम्र मात्र आठ वर्ष है और वह कक्षा तृतीय का विद्यार्थी है। इतनी छोटी उम्र में वह पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलकूद एवं दूसरी गतिविधियों में भी बहुत होषियार है।
सुधीर अपनी कम्पनी के कार्यों में इतना व्यस्त रहता था कि अक्सर ऑफिस का काम घर पर लाकर करता है एवं उसकी पत्नी शालिनी जो कि एक गृहिणी है वह अपने घर के कार्यों में व्यस्त रहती है। लेकिन जब भी उसे समय मिलता है तो वह मोबाइल में ही खोई रहती है। अपने-अपने कार्यों में व्यस्त रहने के कारण दोनों सौरभ पर पूरा ध्यान भी नहीं दे पाते। वो जब भी किसी समस्या को लेकर उनके पास जाता है तब वे उसे यह कह कर दूर कर देते हैं कि बेटा अभी समय नहीं है बाद में आना। अपने माता-पिता के इस व्यवहार से सौरभ अपने आपको उपेक्षित महसूस करता है एवं प्रायः खोया-खोया सा रहता है।
मम्मी-पापा का अपने प्रति इस तरह के व्यवहार बारे में उसने बहुत सोचा और उसी सोच के चलते उसके दिमाग में एक विचार आया और वह अपने पापा के दोस्त एवं फैमिली वकील शर्माजी के ऑफिस अपनी समस्या का हल जानने के लिए गया।
शर्माजी- ‘‘अरे सौरभ बेटा तुम! यहाँ कैसे आना हुआ?’’
सौरभ- ‘‘नमस्ते अंकल, मुझे आपसे एक जरूरी बात करनी है।’’
शर्माजी- ‘‘बताओ बेटा, क्या जरूरी बात करनी है मुझसे।’’
सौरभ- ‘‘मुझे अपने मम्मी-पापा से तलाक चाहिए।’’
शर्माजी- ‘‘क्या! तलाक…..!!! लेकिन क्यों?’’
तब सौरभ अपनी वस्तुस्थिति से उन्हें अवगत कराता है कि कैसे उसके माता-पिता प्रत्येक समय उसे उपेक्षित करते रहते हैं।
सौरभ की बातों को गौर से सुनने के बाद शर्माजी एक निर्णय पर पहुँचते है एवं सुधीर एवं शालिनी के नाम से नकली तलाक के पेपर तैयार करवा कर सौरभ के साथ उनके पास जाते हैं।
अचानक वकील शर्माजी को अपने घर पर आया देखकर सुधीर एवं शालिनी लगभग चौकते हुए एक साथ बोलते हैं कि- ‘‘अरे वकील साहब! आप यहाँ, सब ठीक है ना?’’
शर्माजी- ‘‘सुधीरजी, शालिनीजी मैं आप दोनों के लिए तलाक के पेपर तैयार करवा कर लाया हूँ। आप दोनों इन्हें अच्छे से देख लीजिए एवं इन पर अपने हस्ताक्षर कर दीजिए।’’
तलाक का नाम सुनते ही शालिनी लगभग चिखते हुए अपने पति सुधीर से बोली- ‘‘क्या तलाक…! तुम मुझें तलाक दे रहे हों, लेकिन क्यों।’’
सुधीर ने उससे कहा- ‘‘मैं क्यों तुम्हें तलाक दूँगा।’’
इस बात को लेकर दोनों में काफी देर तक बहस एवं झगड़ा चलता रहा। कुछ समय पष्चात् शर्माजी ने उन्हें रोकते हुए कहा कि- ‘‘ये तलाक के पेपर तो नकली है और ऐसा होना संभव नहीं है। लेकिन क्या आप दोनों यह जानना नहीं चाहोगें कि आपके बीच तलाक क्यों होना चाहिए?’’
कुछ समय तक तो वहाँ पर चुप्पी-सी छा गई। उस चुप्पी को तोड़ते हुए शर्माजी ने कहा- ‘‘सुधीरजी, शालीनीजी आपके तलाक की असली वजह है आपका बेटा सौरभ।’’
सुधीर एवं शालिनी ने लगभग एक स्वर में कहा- ‘‘क्या…..! सौरभ।’’
वकील साहब ने आगे कहा- ‘‘हाँ…..हाँ…..सौरभ। आज वह मेरे ऑफिस आया और आप दोनों के द्वारा खुद के उपेक्षित होने की व्यथा मुझें बताई। क्योंकि आप दोनों के पास अपने एकमात्र संतान के लिए समय ही नहीं है। सुधीरजी! आप अपने ऑफिस के कार्यों में एवं शालिनीजी आप अपने गृहकार्यों के साथ-साथ अपने मोबाइल में इतनी व्यस्त रहती है कि सौरभ के लिए समय ही नहीं निकाल पाती है। इसी कारण जब भी वह किसी समस्या को लेकर आपके पास आया तो आप दोनों ने उसकी ओर ध्यान नहीं देते हुए कहा कि बेटा अभी समय नहीं है बाद में आना। इतनी छोटी उम्र में सौरभ के दिमाग में यह बात घर कर गई की जब मेरे माता-पिता के पास मेरे लिए समय ही नहीं है तो ऐसे माता-पिता का मेरे जीवन में होने या न होने से क्या फर्क पड़ता है।’’
शर्माजी ने आगे कहा- ‘‘सौरभ ने दृढ़ता के साथ आकर मुझसे कहा कि अंकल मुझे मेरे माता-पिता से तलाक चाहिए। अब आप दोनों बताइये कि इतने छोटे से बच्चें के मन में ऐसा विचार आना क्या उचित है?’’
‘‘सुधीरजी, शालिनीजी आप दोनों इस बात का अवष्य ध्यान रखे कि अब वह बड़ा हो रहा है। मैं मानता हूँ कि आप दोनों ने उसे प्यार, स्नेह एवं सभी तरह की सुख-सुविधाएँ दी है। लेकिन इन सबके बीच उसे यह बात हमेषा खलती रहती हैं कि मम्मी-पापा के पास उसके लिए समय ही नहीं है, जिसकी उसे इस उम्र में सबसे ज्यादा जरूरत हैं।
आप दोनों का उसके साथ ऐसा व्यवहार करना क्या उचित है? आपके ऐसा करने से उसके मासूम मन एवं स्वास्थ्य पर कोई गलत असर तो नहीं पड़ रहा है? यह भी हो सकता है इन सबके चलते हुए वह किसी गलत राह पर निकल जाए, जिसका सबसे बड़ा प्रभाव उसके केरियर को बनाने पर पड़ेगा। जरा सोचिए कि आपकी नज़रअंदाजी ;प्हदवतमद्ध कई उसे गलत दिषा में तो नहीं ले जा रही है। कहीं उसके छोटे से मन में भविष्य में होने वाली किसी भयानक स्थिति को मजबूती तो नहीं दे रहा है, जिसका नुकसान आप दोनों को शायद बुढ़ापे में उठाना पड़ें।’’
मित्रों! मैं जानता हूँ कि आज के दौर में प्राइवेट सेक्टर में कार्य करना कितना मुष्किल हो गया है और यह भी मानता हूँ कि सभी अभिभावक अपने बच्चों की परवरिष अच्छे से करते हैं। लेकिन मेरा ऐसा मत है कि हालात कैसे भी हो फिर भी उन सभी से गुजरते हुए बच्चें को अपनी आत्मीयता दे एवं उनके साथ हरदम खड़े रहें। उसके मनोबल को हमेषा बढ़ाएँ। प्रत्येक स्तर जैसे- खेलने में, पढ़ने में एवं मनोरंजन के समय में भी उसका साथ दे। एक अच्छा मित्र बनने का प्रयास करें। इसी से बच्चें का जीवन व भविष्य सँवरेगा और उसमें अच्छे संस्कारों का विकास होगा। जिससे आगे जाकर वह अपने आसपास सभी में अच्छे संस्कारों का संवर्द्धन कर पाएँगा। अभी किया हुआ यह सद् प्रयास उसे आपकी वृद्धावस्था के समय में भी आपके सम्मुख रख पाएगा।
— राजीव नेपालिया (माथुर)
