कुण्डली/छंद

छंद – मन हरण घनाक्षरी

अक्षुण्ण मिलेगा ज्ञान, करना गुरु का मान,
लेकर मन संज्ञान, भूख तो मिटाइए ।
उगते सुंदर फूल, जिनकी रक्षा में शूल,
गुरु चरणों की धूल, माथे तो लगाइए ।।

करने को भव पार, बना गुरु पतवार,
चाहते यदि उद्धार , गुरु तो बनाइए ।
लेकर गुरु से ज्ञान, बढ़ाए उनका मान,
बनकर के विद्वान, सुगंध फैलाइए ।।

रहते गुरु के संग, सीखते जीने के ढंग,
खिले चेहरे के रंग, इंसान बन पाए।
नींद अगर हो भंग, शिथिल हो जाते अंग,
होने चाहे जो भी चंग, गुरु शरण जाए ।।

गुरु से लेकर शिक्षा, देता कुशल परीक्षा,
गुरु जिनको दे दीक्षा, शिष्य वही कहाए ।
बिना सुने गुरु मंत्र, काम करे नहीं जंत्र,
सुखी रहे कब तंत्र, शिष्य शीश नवाएं ।।

— लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’

लक्ष्मण रामानुज लड़ीवाला

जयपुर में 19 -11-1945 जन्म, एम् कॉम, DCWA, कंपनी सचिव (inter) तक शिक्षा अग्रगामी (मासिक),का सह-सम्पादक (1975 से 1978), निराला समाज (त्रैमासिक) 1978 से 1990 तक बाबूजी का भारत मित्र, नव्या, अखंड भारत(त्रैमासिक), साहित्य रागिनी, राजस्थान पत्रिका (दैनिक) आदि पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, ओपन बुक्स ऑन लाइन, कविता लोक, आदि वेब मंचों द्वारा सामानित साहत्य - दोहे, कुण्डलिया छंद, गीत, कविताए, कहानिया और लघु कथाओं का अनवरत लेखन email- lpladiwala@gmail.com पता - कृष्णा साकेत, 165, गंगोत्री नगर, गोपालपूरा, टोंक रोड, जयपुर -302018 (राजस्थान)