हमीद कानपुरी के दोहे
मुश्किल से तेरी नहीं, हरगिज़ रब अंजान।
हर मुश्किल तेरा ख़ुदा, करता है आसान।
मैं को अब पीछे करें, हम कर अंगीकार।
खुद की खातिर है भला, कर लें ये स्वीकार।
जायदाद धन धान का, होता इक दिन अंत।
मान और सम्मान तो, होता सदा अनंत।
इधर उधर की बात में, मत फसना अब यार।
अपने हर इक ख़्वाब को, करना है साकार।
इंसानी फितरत नहीं, है इतनी आसान।
पल में रत्ती तौल में, पल में तोला मान।
यहाँ दिखे छोटा बड़ा, इंसां से इंसान।
जाने कैसा है यहाँ, लोगों का ईमान।
— हमीद कानपुरी
