छंद – मन हरण घनाक्षरी
अक्षुण्ण मिलेगा ज्ञान, करना गुरु का मान,
लेकर मन संज्ञान, भूख तो मिटाइए ।
उगते सुंदर फूल, जिनकी रक्षा में शूल,
गुरु चरणों की धूल, माथे तो लगाइए ।।
करने को भव पार, बना गुरु पतवार,
चाहते यदि उद्धार , गुरु तो बनाइए ।
लेकर गुरु से ज्ञान, बढ़ाए उनका मान,
बनकर के विद्वान, सुगंध फैलाइए ।।
रहते गुरु के संग, सीखते जीने के ढंग,
खिले चेहरे के रंग, इंसान बन पाए।
नींद अगर हो भंग, शिथिल हो जाते अंग,
होने चाहे जो भी चंग, गुरु शरण जाए ।।
गुरु से लेकर शिक्षा, देता कुशल परीक्षा,
गुरु जिनको दे दीक्षा, शिष्य वही कहाए ।
बिना सुने गुरु मंत्र, काम करे नहीं जंत्र,
सुखी रहे कब तंत्र, शिष्य शीश नवाएं ।।
— लक्ष्मण लड़ीवाला ‘रामानुज’
