कविता

बारिश में भीगता शहर

बारिश आई, और शहर की सड़कों ने सांस ली,
धूल में सनी दीवारों पर बूंदों की थाप सी लगी।
छतों से टपकती बूँदें जैसे पुरानी यादें हों,
हर गली, हर मोड़, कुछ कहने को तैयार सी लगी।

कहीं नालियों से बहते प्लास्टिक के सपने,
कहीं छातों के नीचे भी भीगते अपने।
चाय की दुकान पर जमा हुई भीगी उम्मीदें,
और ऑफिस जाती भीड़ की फिसलती चिंता की रेखाएँ।

मोबाइल में कैद होते बादलों के वीडियो,
तो कहीं पंखे के नीचे रखी बाल्टी की विवशता।
किसी के लिए “रिमझिम रोमांस”,
तो किसी के लिए टूटी छत, और सोने की मजबूरी।

सड़कों पर लगे जलजमाव का विरोध मौन,
नेताओं के वादों पर हँसती बारिश की बाँसुरी।
ट्रैफिक की लहरों में तैरती स्कूटी,
और खोखों में भीगते गरीबों की भूख अनकही।

पानी ने धो दिए कुछ झूठे चेहरे भी,
जो हर मौसम में मासूमियत ओढ़े रहते थे।
मगर कुछ चेहरे और गहरे हो गए,
कीचड़ में भी सच्चाई के फूल खिलते रहे।

बारिश, तू सिर्फ पानी नहीं,
तू आईना है इस शहर की असलियत का।
जो छतरी के नीचे मुस्कराता दिखता है,
वो भीतर से अकसर भीगता है अकेले ही।

— प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh