अपनी पहचान छुपाना क्यों?
अपनी पहचान छुपा करके
दल से पहचान बताओगे,
खो जायेगा नाम तुम्हारा
वजूद कैसे दिखाओगे,
दल तुमसे है तुम दल से नहीं
दल बनते और बिगड़ते हैं,
मानसून के आते ही बादल
उमड़ उमड़ घुमड़ते हैं,
सामाजिक प्रस्थिति में
कहां खड़े हो तुम देखो,
यदि हो निचले पायदानों में
भविष्य औरों को मत फेंको,
पहले पढ़ो,लिखो और पढ़ाओ,
फिर अपना वजूद बनाओ,
गर होओगे मजबूत यहां पर
दसियों दल वाले आएंगे,
कुछ न कर पाओगे मन से
अपनी नीति का गुलाम बनाएंगे,
कहते रहेंगे भविष्य देश का
पर अपने अनुसार चलाएंगे,
जब भी उठने का आएगा मौका
कुर्सी और दरी बिछवाएंगे,
इशारों पर चलना होगा सदा
आनाकानी में झट लतियाएंगे,
बची खुची इज्जत भी जब
पूरा मिट्टी में मिल जाएगा,
भविष्य बनाने वाला दल फिर
चाय की मक्खी जैसा फिकवायेगा,
नहीं जिसका दमितों के लिए नीति
वो कैसे तेरा उद्धार करेगा,
चिकनी चुपड़ी बातों में फंसा कर
दलालों वाला हाल करेगा।
— राजेन्द्र लाहिरी
