दोहे
कहें गर्व-अधिकार से,नारी दलित यतीम।
नाम नहीं नारा नहीं , नारायण हैं भीम।।
जन्म हुआ रे भीम का,खुशी महल-खपरैल।
शंखनाद है न्याय की, तिथि चौदह अप्रैल।।
समता औ’ सम्मान ही, संविधान की थीम।
सृजित किए आंबेडकर,बोलो जय जय भीम।।
शिक्षित बनो संघर्ष करो, रहो संगठित और।
चलो बुद्ध के राह पर, बनो राष्ट्र-सिरमौर।।
थी मानवता के लिए , मनु की नीति अफीम।
खाक किए आंबेडकर, बोलो जय जय भीम।।
जनमानस कल्याण ही, है जिसका अस्तित्व।
माने उसके ज्ञान का , लोहा सारा विश्व।।
प्रतिज्ञा बाईस भली, करे जगत कल्याण।
हैं आंबेडकरवाद की, मूल मंत्र औ’ प्राण।।
बाभन बनिया वैश्य क्या,क्या कुर्मी कुम्हार।
दुश्मन से लोहा लिये, पासी खटिक चमार।।
मनु का ब्राह्मणवाद रे,जल-भुन हुआ अधीर।
व्यासपीठ पर बैठ ज्यों, बाँचा कथा अहीर।।
क्या क्रिसमस क्या लोहड़ी,क्या होली क्या ईद।
जाति निगलती आ रही, समता की उम्मीद।।
क्या रिश्ता क्या बन्धुता, जाति गले की फाँस।
घुट-घुट कर अब जी रही,मानवता हर साँस।।
शिक्षा है वो शेरनी, शब्द-अक्षर वो दूध।
पिये जो जितना ज्यादा,लंबा टिके वजूद।।
तिल-तिल मरता रोज़ है,भूखा नंगा जान।
जाति नहीं ये गोह है, चबा रही इंसान।।
खून माँस भी एक है, जाति योनि भी एक।
फिर नरेन्द्र हैं क्यों नहीं, सभी आदमी एक ?
जिस मिट्टी के आप हैं, उसी मिट्टी के सूद।
ब्राह्मण देवता बोलिए, क्यों अछूत हैं सूद ?
वे नरेन्द्र पशुतुल्य हैं, क्या ब्राह्मण क्या सूद।
अन्तस में जिनके नहीं, मानवता मौजूद।।
ऊँच-नीच की भावना, छूआछूत का मैल।
शिक्षा निष्प्रभावी बनी,जाति-धर्म के बैल।।
— नरेन्द्र सोनकर ‘कुमार सोनकरन’
