कहानी : कोख में सिसकती बेटी
कोख में किसी बच्चे की पहली चीख, बाहर आने के बाद की नहीं होती। वह तो भीतर ही कहीं, सिसकती, सहमी, डरी हुई गूंजती रहती है… जब वह समझ जाती है कि उसे इस दुनिया में आने की इजाज़त शायद न मिले।
सोनोग्राफी मशीन की स्क्रीन पर नन्हा सा आकार हिल रहा था — धड़कता हुआ, जीता-जागता, इंसान बनने की जद्दोजहद करता हुआ। डॉक्टर ने अपनी निगाहें स्क्रीन से हटाकर धीरे से कहा, “बेटी है।”
उसके बाद जैसे सन्नाटा छा गया।
आरती की साँसें जैसे रुक गईं। सामने बैठा उसका पति विक्रम, जो अब तक मुस्करा रहा था, अब कुर्सी की पुश्त पर झुक गया।
डॉक्टर ने आगे कुछ नहीं कहा। वह जानती थी, कहने की ज़रूरत नहीं थी।
आरती 26 साल की थी, गाँव से शहर ब्याह कर आई थी। हँसमुख, पढ़ी-लिखी, सपनों में रंग भरने वाली। शादी के दो साल बीते थे, ससुराल वालों का एक ही राग था — “पोता चाहिए, खानदान का दीपक चाहिए।”
जब आरती ने पहली बार गर्भधारण किया, तो सास ने पहले ही कह दिया था, “बेटी निकली तो जिम्मेदार तुम होगी।” पहली बार डर उसकी कोख में पैबस्त हुआ। लेकिन वह बेटा निकला — अर्जुन।
खुशियाँ मनाई गईं, मिठाइयाँ बांटी गईं। आरती को भी माँ बनने का सुख मिला। पर जो माँ थी, वही अब ‘मशीन’ मानी जाने लगी।
“दूसरा बेटा हो, तो घर की ताकत बढ़े,”
“बेटी हो गई तो क्या होगा?”
“बेटी बोझ होती है।”
ऐसे ही वाक्य थे जो हर दिन उसकी नसों में उतरते जा रहे थे।
इस बार भी आरती गर्भवती थी, और रिपोर्ट ने बता दिया था — बेटी है।
विक्रम ने घर आते ही गुस्से में कहा, “अबॉर्शन करवा दो।”
आरती रो पड़ी, “वो भी तो बच्ची है… हमारी बच्ची।”
विक्रम चीखा, “मुझे बहस नहीं चाहिए, फैसला चाहिए!”
रात भर वह चुप रही। वह जानती थी कि अगली सुबह उसे एक “गलत गर्भ” को हटाने के लिए ले जाया जाएगा।
लेकिन उस रात, पहली बार उसने अपनी कोख से बात की।
“बेटी,” उसने पेट पर हाथ रखते हुए कहा,
“माफ करना… मैं बहुत कमज़ोर हूँ। मैं तुझे वो दुनिया नहीं दे पाऊंगी जो तुझे चाहिए।”
और तभी,
एक बहुत धीमी, अनकही आवाज़ आरती के भीतर गूंज उठी —
“माँ, मैं आना चाहती हूँ। मैं इस अंधेरे कोनों को छोड़कर तेरी गोद में छुपना चाहती हूँ।
मैं सांस लेना चाहती हूँ, तितलियों से बातें करना चाहती हूँ, पिता की अंगुली पकड़कर चलना चाहती हूँ।
क्या तुम मेरी पहली रक्षक नहीं बन सकती माँ?”
आरती सिहर गई।
क्या वाकई कोख में भी कोई आवाज़ होती है?
या शायद, यह उसकी अंतरात्मा थी जो अब तक चुप थी।
अगली सुबह सब तय था।
क्लीनिक का नाम था — “जीवन समाधान सेंटर”
कितनी विडंबना थी — जहां जीवन को ‘समाप्त’ किया जाता है, वहाँ का नाम ‘जीवन समाधान’ था।
आरती को स्टेचर पर लिटाया गया।
डॉक्टर ने औपचारिकता पूरी की।
आरती की आँखों से आँसू बहते जा रहे थे।
और तभी-
“रुकिए!”
आरती चिल्ला पड़ी —
“मैं ये गर्भपात नहीं करवाऊंगी!”
सन्नाटा।
डॉक्टर चौंक गए, विक्रम आगबबूला हो गया।
“तू पागल हो गई है क्या?”
“हाँ, अगर बेटी को बचाना पागलपन है, तो हाँ… मैं पागल हूँ!”
आरती उस दिन पहली बार पूरे आत्मविश्वास के साथ खड़ी हुई थी।
उसकी आवाज़ में न कोमलता थी, न डर — बस साहस था।
वह घर नहीं लौटी।
अपनी बहन के घर जाकर रहने लगी।
विक्रम ने बात करना बंद कर दिया।
सास ने मोहल्ले में बदनामी करवा दी।
“बहू बगावत कर गई,” वो कहती।
लेकिन आरती ने हार नहीं मानी।
वह अपनी बच्ची के लिए जी रही थी।
हर रोज़ जब वो पेट पर हाथ रखती, तो महसूस करती — एक नन्हा जीवन भीतर उग रहा है, जिसे जड़ से काटने की इजाज़त वह नहीं दे सकती।
समय बीता।
नौ महीने पूरे हुए।
और एक दिन आरती माँ बनी — बेटी की माँ!
बेटी का नाम रखा — नयना
क्योंकि अब वह आँखे खोलकर दुनिया को नया रूप दिखाना चाहती थी।
नयना की आँखें बड़ी और चमकदार थीं, जैसे उसके भीतर जीवन की लपटें जल रही हों।
आरती ने एक एनजीओ जॉइन किया — ‘कोख की पुकार’।
वह अब उन महिलाओं से मिलती, जो कोख में बेटियों को खो चुकी थीं या खोने वाली थीं।
वह बोलती, लिखती, लड़ती — कभी कानून के दरवाज़े पर, कभी पंचायत के चौपाल में।
आरती ने न केवल बेटी को जन्म दिया, बल्कि अपने भीतर की औरत को भी पुनर्जन्म दिया।
एक दिन वह गाँव में एक बैठक में गई जहाँ लड़कियों की भ्रूणहत्या पर चर्चा हो रही थी।
वहाँ उसने विक्रम को देखा।
अब उसकी आँखों में पछतावे की परछाई थी।
बोलते हुए आरती की आवाज़ थरथराई, पर रुकी नहीं —
“माँ होना साहस है।
बेटी को जन्म देना एक जिम्मेदारी है,
लेकिन बेटी को बचाना — एक क्रांति है।
और आज मैं कह सकती हूँ — मैंने क्रांति की है।”
हॉल तालियों से गूंज उठा।
कई वर्षों बाद-
आरती अब एक जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता थी।
नयना बड़ी हो गई थी — 12वीं की बोर्ड परीक्षा में राज्य की टॉपर।
पत्रकारों ने पूछा, “आपको क्या बनना है?”
नयना मुस्कराई और बोली —
“मैं बेटी बनकर माँ का सपना पूरा करूंगी — मैं डॉक्टर बनूंगी, ताकि कोई कोख में सिसकती बेटी फिर न मारी जाए।”
आज भी कई जगह बेटियाँ कोख में दम तोड़ रही हैं।
उनकी सिसकियाँ ना तो सुनाई देती हैं, ना दिखाई,
लेकिन कहीं कोई आरती, फिर खड़ी हो जाती है —
अपनी बेटी के लिए,
हर बेटी के लिए।
क्योंकि माँ सिर्फ जन्म नहीं देती,
वह समाज के अंधकार में दीप भी जलाती है।
— प्रियंका सौरभ
