शब्दों को ही ताकत बनाएं
कल्पना के तुरंग पर होकर सवार, शब्द चले आते हैं,
अपनी अहमियत बताकर, हमें सचेत कर संवार जाते हैं.
कभी सूर्य-सम तेजवान, कभी चंद्र-सम शीतल होते हैं शब्द,
रंगीन-संगीन भी होते हैं, कभी सोना कभी पीतल होते हैं शब्द.
कभी गरजते हैं बरसते नहीं, कभी बिन गरजे बरस जाते हैं,
शब्द घाव भी देते हैं लगाव भी, अवसाद-तनाव भी बन जाते हैं.
संत कबीर के ढाई आखर, प्यार-इश्क़-प्रेम को बखूबी दर्शाते हैं,
अपने आप में होते हैं सम्पूर्ण, घृणा-द्वेष की जलन से कभी तपाते हैं.
कभी 2 जून की रोटी खिलाते हैं, कभी हाथ से निवाला छीन जाते हैं.
बिखेरते भी हैं, समेटते भी हैं, आकर्षित-विचलित भी करते हैं शब्द,
शब्दों का शिल्पकार-लेखक-कवि-साहित्यकार भी बनाते हैं शब्द.
कभी शब्द बन जाते कटार, कभी शब्द बन जाते गले का हार,
सोच समझ कर बोले हों तो, रखते हैं अपना बनाने की शक्ति अपार.
राजनीति की कूटनीति में होते हैं सक्षम, सद्गति के भी संचालक हैं,
शब्द एकांत-शोर में भी होते हैं सक्रिय, संवेगों-भावनाओं के वाहक हैं.
शब्दों से शब्दों की महिमा सजाएं, शब्दों की तालियां-नगाड़े बजाएं,
स्वांतः सुखाय-पर हिताय हों संस्कार, शब्दों को ही ताकत बनाएं.
— लीला तिवानी
