आई बरखा बहार
आई बरखा बहार, पड़ी रिमझिम फुहार,
गीत गाऍं मल्हार, खुश हुआ देखो संसार ।
बरसी बूॅंदों की झड़ी, बूॅंदे छोटी कुछ बड़ी,
हिय में ख़ुशी फूट पड़ी, बॉंधी प्रेम की कड़ी ।
अमृत बरसाऍं आसमान, झूम उठे हैं किसान,
धरती हुई है धनवान, आई चेहरे पर मुस्कान ।
सोम रस प्राणियों को मिला, पत्ता पत्ता खिला,
मीठा गीत गाऍं कोकिला, भूले सब शिकवा गिला ।
पक्षी गुनगुन करें शोर, झूम उठे बागों में मोर,
छाई घटा घनघोर, “आनंद” बिखरा चहुॅं ओर ।
जीवन में रंग खुशी के छाऍं, कजरी गीत लुभाऍं,
झूला झूले नाचे गाऍं, सावन का त्योहार मनाऍं ।
मेहंदी हाथों में रचाई, सजना के मन को भाई,
अणहद खुशियॉं छाई, जुग जुग जिए धणी लुगाई ।
शिव शंकर का करें श्रृंगार, बम बम बोले संसार,
उमड़ी आस्था अपार, गूॅंजें शंभु की जयजयकार ।
— मोनिका डागा “आनंद”
