ग़ज़ल
उसकी याद को आना हैं और चले जाना हैं
पलकों से आसूं को गिराना हैं और चले जाना हैं ।।
जहां पे चीख के रोने को जी चाहता हैं
बस वही पे सब्र दिखाना हैं और चले जाना हैं ।।
दिन को भी काटना हैं किसी तरह
फिर रात को भी आना हैं और चले जाना हैं ।।
हालातों के बोझ तले दब के मर न जाएं जिदंगी
कुछ इसीलिए भी खुद को समझाना हैं और चले जाना हैं ।।
टूटे हुए दिल की ये आखिरी ख्वाइश हैं
के फिर से दिल लगाना हैं और चले जाना हैं ।।
समय के साथ सब कुछ ठीक हो जाता हैं
बस यही भरम मिटाना हैं और चले जाना हैं ।।
के आज भी उसकी कमी दिल दहला देती हैं
उसको ये बताना हैं और चले जाना हैं ।।
वो जो पहला आसूं उसकी तस्वीर पे निकला था
सो आखिरी भी उसकी तस्वीर पर बहाना हैं और चले जाना हैं ।।
अब कहां तक रोके हम भी इसको शगुन
तेरी याद का क्या हैं इसे तो रोज आना हैं और चले जाना हैं।।
— शगुन चौधरी
