ग़ज़ल
सुनो मैं तुम्हे सच में सोचती हूं
प्यासी हूं सो तुम्हे दरिया सोचती हूं ।।
सोचती हूं एक शाम तेरे साथ
उसके बाद रात का भी एक कतरा सोचती हूं ।।
फिर एक सुबह ओझल सी सोचने का बाद
मैं दोपहर का गुजारा सोचती हूं ।।
सोचने पर आऊं तो मर ना जाऊं कही
मैं एक शख्स को इतना सोचती हूं ।।
तुम मेरे बहकावे में ना आ जाना
मैं तो ना जाने क्या क्या सोचती हूं ।।
वो हैं के उसे दुनिया से फुर्सत नहीं
मैं हूं के उसी को अपनी दुनिया सोचती हूं ।।
खुद को खुद से अलग रख कर
उसी का सिर्फ उसी का सोचती हूं ।।
सब्र के फल का सब सोचते हैं शगुन
मैं हूं के फल के आगे का सोचती हूं ।।
सबको बुरा कह के बुरी बन चुकी हूं मैं
उसकी प्यारी हूं उसको प्यारा सोचती हूं ।।
एक गज़ल हर रोज उसकी याद में लिखती हूं
एक शेर उसकी याद में आगे के लिए सोचती हूं ।।
वो शख़्स भी परेशान होकर बिछड़ जाएगा एक दिन
मैं हूं के उस शख्स का इतना सोचती हूं ।।
— शगुन चौधरी
