दरिया दिली
दिया और रिया दोनों सगी बहनें, दोनों हमेशा पूरे घर को खुशी से गुजायान रखते , लेकिन कहा जाता है ना कि दस बेटियां भी एक बेटे की जगह नहीं ले सकती। आखिर घर का चिराग जो उन्हे कहा जाता है ।
हर माता-पिता की तरह शामली और कुटूस तो उनके दादाजी को भी बेटे की चाह सता रही थी । शुरू में तो शामली अक्सर तिसरे का विरोध करती रही लेकिन वक्त के साथ उसका भी मिजाज बदल गया । वह भी कभी डॉक्टर साहब ओझा- गुनी तो कभी परमेश्वर से ही दुआ मांग लेती।
हम सब जानते है परमेश्वर के पास देर है, अंधेर नहीं ! करीब सोलह साल बाद शामली की पुनः तबीयत बिगड़ी, बेटी के चाह ने उसे अंधा कर दिया था । सब कुछ जानते हुए भी दूसरी ही महीने में कुटुश ने डाक्टरी जांच से बच्चे की लिंग जानने की इच्छा व्यक्त की। डॉक्टर साहब भी उनके लड़के की इच्छा देख उनकी ही रंग में ढल गए
उन्होंने भी बेटे की ही संभावना जताई ।
। डॉक्टर साहब जब भी उनहें जांच के लिए देखते उनके सामने समाज का ऐसा प्रतिबिंब सामने आता वह दो पल सोच में पड़ जाते। आजादी के इतने सालों बाद भी इतना अंतर गुरराते मगर फिर भी मौन ही रहते !
देखते-देखते नौ महीने बीत गए ।शामली की थोड़ी तबियत बिगड़ते ही कुटुश फौरन उसे अस्पताल लेकर पहुंचा । कुछ वक्त ही बीता था कि बच्चे की कराहने आवाज गूंजायन होते ही शालिनी प्रश्नों की ढेर पर खड़ी हो गई। इतने में नर्स ने फौरन बाहर जाकर –“बधाई हो , आपके घर लक्ष्मी का शुभागमन हुआ है”
क्या?” उसने आश्चर्य भरे स्वर में पूछा
हां आपके घर लक्ष्मी आई है। नर्स ने पुनः उत्तर दिया।
यह सुनते ही कुटुश और सारे परिवार के चेहरे की लालिमा मानो काजल की रेखाओं में बदल गई। पूरा परिवार शून्य पड़ गया। ये कैसे हो सकता है “! कुटुश उसके कमरे में प्रवेश करते ही , यह कैसे हो सकता है! डॉक्टर साहब ने तो हमें लड़का कहां था ।कुटुश ने कहा।
हां , वही तो मैं भी नहीं समझ पा रही हूं। यह कैसे!
डॉक्टर साहब ने तो सोनोग्राफी में देखकर हमें बताया था फिर भी….
इतने में भागा दौड़ी में सासू मां अंदर प्रवेश कर दर्जन लगाने का इरादा है क्या ! उन्होंने आक्रोश भरे शब्दों में कहा
मम्मी जी, नेहा के कराहते स्वर में निकला।
मत बोलो मम्मी ,सिराहने बैठ कुटूश ने झट से कहा।
” जानते हो, एक बेटी मतलब 20 लाख का चूना और सारा जीवन का टेशन!”
सासू मां ने आक्रोश से कहा।
शालिनी और कुट्स दोनों मौन हो सुनते रहे । मन ही मन कुटूश का आक्रोश भी बढ़ता ही जा रहा था। मां के निकलते ही वह फौरन बाहर निकाल डॉक्टर चैंबर पहुंचा। लाख मना करने के बावजूद भी उसने जोर की आवाज लगाई। डॉक्टर साहब , डॉक्टर साहब क्या दो मिनट आपसे बात हो सकती है?
जरूर ,बोलो क्या हुआ। डॉक्टर साहब सब कुछ जानते हुए भी पुनः जानने की इच्छा व्यक्त की।
याद है नेहा रानी जिसका पिछले नौ महीने से आप जांच कर रहे हैं, मोटी- मोटी रकमों की दवाइयां दे रहे थे। हर बार लड़का होने का दावा ठोक रहे थे। वह सब झूठ था ? आप तो इस कुर्सी पर बैठने के काबिल ही नहीं ! क्योंकि इस पर बैठने वाला तो इंसान , इंसान नहीं भगवान होता है! जो हमेशा सच का साथ देता है । मगर आप तो इंसान कहलाने के लायक भी नहीं।
डॉक्टर साहब भी गुस्से से लाल पीला हो रहे थे, लेकिन वक्त को भापते हुए, खुद को संभालते हुए कहा— हो गया हो आपकी पूरी बात ,तो अब मैं कुछ कहूं ?
‘ जी कहिए, आपने जो अभी यहां कहा , इस कुर्सी पर बैठने वाला इंसान , इन्सान नहीं भगवान होता है। तो “भगवान जीवन देता है लेता नहीं” । तो सोचिए मैं भला कैसे किसी की जान ले सकता हूं !और वह तो साक्षात लक्ष्मी का रूप है। “मतलब आप पहले से सब कुछ जानते थे और आपने हमसे झूठ बोला ,मगर क्यों? आपने हमें क्यों नहीं बताया?
क्या बताता, यदि सच बताता तो आप लोग उस नादान की जान ले लेते, और उस पाप का भागीदारी मुझे भी बनना पड़ता । आप जैसे लोगों के कारण ही सरकार ने लिंग जानकारी हेतु कड़ी कानून भी बना रखी है , डॉक्टर साहब ने कहा
साहब वो मैं जानता हूं, लेकिन अब मैं क्या करूं? आंसू बहते हुए कुटुश ने कहा।
कैसे मै तीन-तीन बच्चियों का पालन -पोषण, पढ़ाई- लिखाई, शादी -विवाह, कैसे कर पाऊंगा ! मात्र 40, 000 के वेतन में क्या कर पाऊंगा मैं !
डॉक्टर साहब ने ढांढस बांधते हुए कहा आप इतना मत सोचिए, देने वाला, लेने वाला और करने वाला तीनों का कर्ताधर्ता तो ऊपर वाला है, हम तो सिर्फ एक जरिया मात्र है, फिर इतना क्यों सोचना ! और जब भगवान ने पेट दिया ही है तो भरेगा भी वही, हमें तो बस थोड़ी सी सचेतन और निगाहें मात्र रखनी है। डॉक्टर साहब ने ढांढस बांधते हुए कहा । अच्छा यह बताइए, क्या इस लड़की की जगह लड़का होता, तो क्या कुछ बदल जाता क्या उसकी पढ़ाई- लिखाई, जीवन- यापन, शादी- विवाह एक पिता का धर्म नहीं होता, डॉक्टर साहब ने जानने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन फिर भी मैं समझ सकता हूं । आपको एक बारिश की जरूरत थी, आपके बुढ़ापे की लाठी की फिक्र सता रही है ।
लेकिन सच कहूं तो आज, लड़कियों को एक लायक बनाना लड़कों से कहीं ज्यादा आसान है । उसकी कोमल भावनाओं को थोड़ी सी सजगता और अपनेपन से जीता जा सकता है। लेकिन वही एक लड़का को… खैर छोड़िए , यह सब ज्यादा दिक्कत हो उस नन्ही को मुझे समझा दीजिए। मुझे बेटी का बहुत शौक है ।
इतना सुनते ही कुटुश दो पल आश्चर्य से नीची निगाहों से नजरे झुकाए वहां से निकल गया।
— डोली शाह
