उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 6)

श्रीराम के वनगमन की बात सुनकर भरत जी स्तब्ध रह गये। उन्होंने सोचा कि अवश्य श्री राम से जाने-अनजाने में कोई अपराध हो गया है, जिसके कारण उनको देशनिकाला देना पड़ा है। इससे उनको अपने वंश की छवि मलिन हो जाने की भी चिन्ता हुई। इसलिए उन्होंने अपना सन्देह मिटाने के लिए माता से ही पूछा- ”माँ! भैया ने किसी ब्राह्मण का धन तो नहीं हड़प लिया था? कहीं उनके हाथ से किसी धनी या निर्धन व्यक्ति की हत्या तो नहीं हो गयी थी? कहीं उनका मन किसी परायी स्त्री की ओर तो नहीं चला गया था? किस अपराध के कारण भैया-भाभी को राज्य से निर्वासित किया गया है? यह मुझे बताइए।“

जब भरत जी ने इस प्रकार सीधा प्रश्न पूछा तो कैकेयी को पूरी बात बतानी पड़ी। उसने कहा- ”बेटा! राम ने न तो किसी ब्राह्मण का धन हरण किया है, न किसी धनी या दरिद्र की हत्या की है और न किसी परायी स्त्री पर दृष्टि डाली है। उनके वन जाने का कारण अलग है। मैंने सुना था कि राजकुमार राम का राज्याभिषेक होने जा रहा है। तब मैंने तुम्हारे पिता से अपने दोनों वरदान माँग लिये। एक में तुम्हारे लिए राजगद्दी और दूसरे में राम के लिए चौदह वर्ष का वनवास।“

भरत जी पर अपनी बात की विपरीत प्रतिक्रिया होती देखकर कैकेयी ने फिर कहा- ”पुत्र! तुम्हारे सत्य प्रतिज्ञ पिता ने अपने वचन पूरे करने के लिए राम को सीता और लक्ष्मण के साथ वन को भेज दिया। परन्तु वे राम का वियोग सहन नहीं कर सके, इससे उन्होंने अपने प्राण त्याग दिये।“

भरत स्तब्ध होकर सब सुनते रहे। अन्त में कैकेयी ने कहा- “पुत्र! अब तुम राजपद स्वीकार करो। तुम्हारे ही लिए मैंने यह सब किया है। इसलिए धैर्य धारण करो और इस निष्कंटक राज्य को ग्रहण करो।”

दोनों भाइयों के वनवास और पिताजी की मृत्यु का समाचार सुनकर भरत जी अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर बोले- “हाय! तूने मुझे मार डाला! मैंने पिताजी को सदा के लिए खो दिया और पितातुल्य बड़े भाई से बिछुड़कर मैं शोक में डूब रहा हूँ। मुझे यह राज्य लेकर क्या करना है? तूने पिताजी को परलोकवासी और बड़े भैया को वनवासी बनाकर मुझे दुःख पर दुःख दिया है। तूने मेरे घाव पर नमक सा छिड़क दिया है।“

कैकेयी ने कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि भरत जी उसका इस प्रकार तिरस्कार करेंगे। उसने तो सोचा था कि भरत प्रसन्नता से राज्य ग्रहण करेंगे और लोग श्री राम को भूल जायेंगे, परन्तु उसने अपने पुत्र को पहचानने में बहुत भूल कर दी।

भरत जी रोते-रोते फिर कैकेयी को कोसने लगे- ”पापिनी! लगता है कि तू इस कुल का विनाश करने के लिए ही यहाँ आयी है। पिताजी ने तुझे हृदय से क्या लगाया कि दहकते अंगारों को छू लिया। तेरे ही कारण मेरे महायशस्वी पिता अत्यन्त दुःख से पीड़ित होकर प्राण त्यागने को विवश हुए हैं। मेरे बड़े भाई श्री राम को तूने क्यों देश से निकाला? उनका क्या दोष था? वे तो तेरा बहुत आदर करते हैं। वे तेरे कहने से ही वन को क्यों चले गये? तूने मेरी माताओं कौशल्या और सुमित्रा को भी बहुत दुःख दिया है। वे कैसे जीवित रहेंगी?

बड़े भैया तो बहुत धर्मात्मा हैं। उनको पता है कि बड़ों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए। वे तो तेरा माता की तरह सदा से पूरा आदर करते रहे हैं। बड़ी माता कौशल्या भी धर्म को जाननेवाली हैं। उनका व्यवहार भी तेरे प्रति बहिन की तरह रहा है। उनके निर्दोष पुत्र को तूने वल्कल वस्त्र पहनाकर वन को भेज दिया। फिर भी शोक से तेरा कलेजा नहीं फटा।

पापिनी! तूने अपने स्वार्थ के लिए मेरे धर्मात्मा पिताजी के प्राण ले लिये। अब समझ ले कि मैं भी तेरे लिए मर गया। तू महाराज अश्वपति के श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुई है, फिर तेरे मन में यह पापबुद्धि कैसे आयी? तुझे राजधर्म का कोई ज्ञान नहीं है। तू इस कुल का विनाश करने के लिए ही रानी बनकर यहाँ आयी है। पिताजी ने तुझे समझने में बहुत भूल कर दी। तू माता के रूप में मेरी शत्रु है।

इस कुल में जो सबसे बड़ा पुत्र होता है वही राज्य का अधिकारी होता है। अन्य भाई उसकी आज्ञा का पालन करते हुए रहते हैं। यही इस कुल की रीति है। पापिनी! तूने इस कुल को कलंक लगाया है। मैं तेरी इच्छा कदापि पूर्ण नहीं करूँगा। मैं वन से अपने निष्पाप बड़े भाई को लौटाकर लाऊँगा। मैं उनको वन से वापस लाकर जीवनपर्यन्त उनकी सेवा करते हुए इस पाप का प्रायश्चित करूँगा और अपने ऊपर लगे हुए इस कलंक को धोऊँगा।”

इस प्रकार बहुत सी कड़ी बातें कहकर भरत जी कैकेयी को देर तक फटकारते रहे और फिर शोकाकुल होकर पृथ्वी पर गिरकर विलाप करने लगे। किंर्तव्यविमूढ़ कैकेयी चुपचाप उनकी फटकार सुनती रही और उनके शान्त होने की प्रतीक्षा करती रही। उसके मुँह से ”पुत्र! पुत्र!!“ के सिवा कुछ नहीं निकल रहा था। भरत जी बहुत देर तक विलाप करने के बाद सँभलकर माता कौशल्या से मिलने जाने के लिए उठकर तैयार होने लगे।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण कृ. 12, सं. 2082 वि. (22 जुलाई, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com