गांव से ही पहचान
शहर हो गया होगा आपके लिए
पर ये है मेरा वहीं छोटा सा गांव,
यहां अभी भी मिलता है मुझको
प्यार भरे दामन की छांव,
वहीं चिड़ियों की चुलबुल बोली
वैसे ही अभी भी कोयल के कांव,
प्यार की छलकती नहीं पर
आज भी टिकी है चलती हुई नाव,
गोबर से लीपती मां बहनें
कच्चे मकान में आज भी रहते लोग,
गरीबी की वहीं बासी रोटी तो
किसी घर आज भी छप्पन भोग,
समय अपने अनुसार परिवर्तन लाता है,
जकड़ी परंपरा से ऊब
बहुत कुछ बदल जाता है
पर नहीं बदलता तो वहीं गांव की खुशबू
जो पवन चलते ही चहुंओर फैल जाता है,
औरों के सुख में सुख तो
दुख में में घनी उदासी उड़ेल जाता है,
जाकर पूछिये मेरे गांव का समृद्ध नाम है,
इस गांव से ही मेरी सारी पहचान है।
— राजेन्द्र लाहिरी
