आविष्कार हूं मैं
मुझमें आंसू की जो धारा है
वह एक दिन प्रवाह बनकर
फूट निकल आएगी बाहर
शक्ति पुंज हूं मैं बेकार नहीं
चुप नहीं हूं निरंतर बोलता हूं
अपने आपसे कयी नयी बातें
अपमान की आग है अंदर
समर्पण की महक है भरपूर
कितना भीगा था मैंने
अपमान की उस झड़ी में
सीखा है मैंने कई पाठ रे,
मेरा हर कदम एक साहस है
संप्रदाय के विरोध में सवाल है
रूकी नहीं वह दौड़ मेरे अंदर
पूरी शक्ति बटोर कर
एकाग्र चित्त में संजोया कर
निकलता था विचारों की वीथी में
नहीं डर है किसी का आज
शांति – क्रांति की राहों में
इस मानव जग में कांति हूं
अपने आप में एक आविष्कार हूं ।
