कैसी यह रीति
अजब निराली ये रीति जगत की
हो रसूक जिसका कोई
बड़ा हो पद से धन से या फिर बल से
सब चाहे सम्बन्ध बनाना उससे
सब अवगुण उसके मिट जाते
दिखे लोगों को बहुत गुणी
निर्बल को न कोई पूछे
हो कितना भी वो गुणी
न रखना चाहे कोई उससे
कोई नाता और सम्बन्ध
अपने भी हो जाये पराये
गैरों की तो बात कोई
वाह री दुनियां कैसी तेरी रीति
