संस्मरण

तुम घायल और मैं स्तब्ध

तुम्हारे पैर में लिपटे धागे की कसावट मानों हृदय को जैसे घायल कर दिया हो प्रकृति शान्त और तुम्हारा यूं चौखट पर गिरना जैसे कोई सन्देश लेकर आये हो कोविड 19 का हर एक पल पिंजरे की भांति लग रहा था। तुम्हें देख कर लगा कि अवश्य कोई ईश्वर का पैगाम लेकर आये होंगे सांसें लड़खड़ा रही थी लेकिन जब तुम्हारे पैर की ओर नजरों का रूख गया तो तब महसूस हुआ तुम भी किसी “पीड़ा से ग्रसित हो”।यह देख हृदय भावुक हो कर तुम्हारे पैरों से लिपटे धागे को खोलने लगा तुम्हारे शान्त मन का दर्द जैसे दिल को छू रहा था जैसे कि यह धागा मेरे दिल से बंधा हो। कुछ दिन तुम्हारा मेरे पास रुकना मानों प्रभु ने एक सबक दिया हो। तुम्हारे पैर के घाव ने एक सप्ताह में मुझे एक अनुभव दिया है। बच्चों का तुम से लगाव होना और मुझे तुम से विछुड़ने की वेदना सता रही थी।

धीरे – धीरे तुम्हारे घाव में परिवर्तन आया और तुम चलने लगे लेकिन बिल्ली का तुम्हारे आस – पास मंडराना ऐसा लगता था कि तुम्हें सुरक्षित रख पाऊंगी या नहीं घर के अन्दर पंखे का डर सता रहा था कि कहीं तुम उड़ने लगे और पंखे की ओर चले गए। बाहर भी नहीं छोड़ सकती थी क्योंकि एक बिल्ली हर रोज़ तुम्हें ताकती रहती।

लेकिन जब तुम्हारे पैर का घाव एक सप्ताह बाद ठीक हुआ तो तुम्हारे उड़ने के इन्तजार ने हृदय को झकझोर दिया। मैं तुम्हें उड़ाना तो नहीं चाहती थी, मगर मैं भी स्वयं कैद थी प्रकृति का ये कहर देखकर यह लगा कि तुमसे मोह नहीं कर सकती बस तुम्हारे एक दो सप्ताह के प्रेम से धन्य हो गई थी ।और स्वयं तुम्हें घर के आगे नीम के पेड़ पर उडा़ कर आ गई लेकिन तुम्हें उड़ानें के बाद जब तुम फिर हर रोज़ मिल कर जाते उस प्रेम भरे दृश्य को देखकर वर्षों पुराने घाव पर मरहम सा लगा। और तुम्हारे इस सन्देश से यह सीख मिली कि नियति और प्रकृति जैसी भी हो प्रेम की खूबसूरती कम नहीं हुआ करती। तुम्हारे उड़ने के बाद करोना भी थमने लगा और आस- पास लोग दिखने लगे। फिर एक उड़ान भरने का ख्याल आया और फिर तुम से दूर चली आई जैसे कि तुम्हारे पैर के घाव ने सिखाया हो कि घबराना नहीं है एक दिन सही समय का सदुपयोग कर पाओगी।

तुम्हारे उस शान्त और दर्द भरे प्रेम से जो सीख मिली छह सा पहले १६ अगस्त २०२० को वह हर एक क्षण तुम्हारे सहयोग की आभारी रहूंगी। क्योंकि तुमने दर्द और असहाय परिस्थितियों में नयी उड़ान भरने की जो सीख दी है। वो सदैव मेरे अन्तस्थ में अनहदों तक समाहित रहेगा। तुमने आभास कराया कि दर्द को सहन करना मुश्किल नहीं बस लक्ष्य और साधना होनी चाहिए। जैसे -जैसे तुम्हारे पैर का घाव भरने लगा उम्मीद की एक किरण नजर आने लगी और प्रकृति से नव मिलन की आश जगने लगी।

इससे यही सीख मिलती है कि हे !मानव कर्म में उद्यमी बन और लोभ, मोह,क्रोध,लालच को त्याग कर स्वतंत्रता से अपने कर्तव्य पथ पर आगे बढ़।हर रोज़ एक नयी किरण का अनुभव ले और सार्थक तथ्यों की उड़ान भर।

फिर लौटकर आना
प्रभु का सन्देश लेकर।
अब थक सी गई हूं
कर्म पथ को देखकर।।
मानवता की वेदना से
बैठी हूं अब हार कर।
सन्देश कुछ नया देना
जो भव सागर पार तर।।

— सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ “सहजा”

सन्तोषी किमोठी वशिष्ठ

स्नातकोत्तर (हिन्दी)