लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 15)
शत्रुघ्न जी का विलाप सुनकर तीनों माताएँ वहाँ आ गयीं। वे पतिवियोग के दुःख और उपवास के कारण बहुत दुर्बल लग रही थीं। उन्होंने भूमि पर चेतनाहीन पड़े हुए भरत जी को सब ओर से घेर लिया और रोने लगीं।
महारानी कौशल्या ने भरत जी को अपनी गोद में ले लिया और उनको स्वस्थ करने का प्रयास करने लगीं और पूछने लगीं- “बेटा! तुम्हें क्या कष्ट है? तुम्हें कोई शारीरिक रोग तो नहीं हो गया? तुम्हारे पिता के स्वर्गवास और बड़े भाई के वनवास के बाद इस राजवंश का जीवन अब तुम्हारे ही हाथ में है। तुम ही हम सबके संरक्षक हो। सच बताओ, तुम्हें राम, लक्ष्मण और सीता के विषय में कोई अप्रिय समाचार तो नहीं मिला है?” वे इस प्रकार कहकर रोने लगीं।
भरत जी अर्द्धमूर्च्छित थे। वे तपस्विनी माता कौशल्या की बातें सुन और समझ रहे थे। दो घड़ी में उनका चित्त स्वस्थ हुआ। रोते हुए उन्होंने माता कौशल्या को बताया- ”माँ! मुझे कोई शारीरिक रोग नहीं है। बस भैया के वियोग में पीड़ित हूँ। चिन्ता मत कीजिए, मुझे उनके बारे में कोई अप्रिय समाचार नहीं मिला है।“ ये शब्द सुनकर कौशल्या सहित सभी रानियों को बहुत सांत्वना मिली।
थोड़ा स्वस्थ होकर भरत जी फिर निषादराज गुह से श्री राम के बारे में पूछने लगे- “भैया, भाभी और लक्ष्मण ने उस दिन क्या खाया था? कहाँ सोये थे?“
इस प्रश्न पर निषादराज गुह प्रसन्न हो गये। उन्होंने बताया- “मैंने कई प्रकार के अन्न से बने खाद्य और फल आदि उनके पास पहुँचाये थे, परन्तु उन्होंने उनको स्वीकार करके केवल स्पर्श करके सब लौटा दिये। उस दिन श्री राम और सीता दोनों ने उपवास ही किया था और केवल लक्ष्मण जी द्वारा लाया हुआ जल ही पिया था। बचा हुआ जल लक्ष्मण जी ने पिया था। फिर वे लक्ष्मण जी द्वारा तैयार की गई कुश-शय्या पर सो गये थे। लक्ष्मण जी हाथ में धनुष लेकर रात्रिभर उनकी रखवाली करते रहे थे। फिर मैं भी अपने धुनष-बाण लेकर वहीं आ गया था।”
भरत जी ने इच्छा प्रकट की- ”बन्धु! मैं उस कुश-शय्या को देखना चाहता हूँ, जहाँ उन्होंने शयन किया था।“ यह सुनकर गुह जी ने उनको इंगुदी वृक्ष के निकट ले जाकर उस कुश-शय्या को दिखाया, जिस पर श्री राम सोये थे। उस शय्या को देखकर भरत जी को बहुत दुःख हुआ और कहा- ”जो श्री राम सदा महलों में नरम शय्याओं पर सोते आये हैं, उन्हें कितने कष्ट सहन करने पड़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि लक्ष्मण जी बहुत भाग्यशाली हैं कि ऐसी परिस्थितियों में भी श्री राम की सेवा कर रहे हैं।“
फिर सबके सामने भरत जी ने वहीं पर प्रण किया- “अब से वनवास के शेष दिनों तक मैं भी ऐसी ही शय्या पर भूमि पर ही सोऊँगा, फल-मूल का ही भोजन करूँगा और वल्कल वस्त्र ही धारण करूँगा।” उनकी यह प्रतिज्ञा सुनकर सभी ने उनकी सराहना की। फिर वे सभी शयन करने चले गये।
गंगा जी के तट पर रात्रि बिताकर प्रातःकाल होते ही सभी ने नित्य कर्म तथा संध्या-वंदन किया। फिर भरत जी ने शत्रुघ्न जी से कहा कि पहले हम पिताजी को जलांजलि देंगे, फिर आगे चलेंगे। तब दोनों भाइयों ने गंगा जी के किनारे खड़े होकर अपने स्वर्गीय पिता महाराज दशरथ को जलांजलि दी और ब्राह्मणों को दान दिया।
फिर उन्होंने शत्रुघ्न जी से कहा- ”भाई! तुम निषादराज गुह को शीघ्र बुला लाओ, वही हमें गंगा जी के पार उतारेंगे।“ यह सुनकर शत्रुघ्न जी जाने को तैयार हुए। वे शिविर से निकल ही रहे थे कि निषादराज गुह स्वयं वहाँ आ पहुँचे।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
श्रावण पूर्णिमा, सं. 2082 वि. (9 अगस्त, 2025)
