लघुकथा

राखी मिलन

राखी के एक दिन पहले तक तो सुधा अपनी भाभी के फोन का इंतजार करती रही, सोच रही थी कि भैया भाभी अब तो विदेश से वापस आ गए हैं, और हम सब मिलकर बच्चों के साथ यह त्यौहार खुशी खुशी अच्छी तरह मनाएंगे और भाभी हमें जरूर बुला लेगी। वैसे भी दिल्ली से मेरठ कितना दूर है 2 घंटे में आराम से पहुंच जाएंगे।
लेकिन जब भाभी का फोन नहीं आया तो आखिरकार रात को सुधा ने भाभी को फोन किया हाल-चाल पूछने के लिए और त्योहार की बधाई दी, सुधा यही सोच रही थी की भाभी अभी बोलेगी कि कल आप सब बच्चों को लेकर यही आ जाओ और यही त्यौहार मनाएंगे पर भाभी ने ऐसा कुछ नहीं किया। बस यही कहती रही हम सब यहां सब ठीक हैं आपके भैया भी ठीक हैं काम ज्यादा है सुबह घर से ऑफिस के लिए निकलते हैं और देर शाम को ही लौटते हैं। कल राखी के त्यौहार की भी उनकी छुट्टी नहीं है।
सुधा को बात समझने में देर नहीं लगी और उसने कह दिया भाभी मैंने इसीलिए एक महीना पहले ही राखी स्पीड पोस्ट से भेज दी थी, क्योंकि हम लोग आएंगे या नहीं आ पाएंगे यह अभी कुछ निश्चित नहीं था, वैसे आप सब ठीक है तो मैं सोच रही हूं कि कल खुद जाकर भैया के हाथों में राखी बांध दूं, आपके विदेश जाने के कारण कई साल से मैं भैया को राखी नहीं बांध सकी।
सुधा अभी अपनी बात पूरी का भी नहीं पाई थी की भाभी ही बीच में बोल पड़ी,
सुधा तेरे भैया तो सुबह-सुबह ऑफिस निकल जाएंगे कल उनकी छुट्टी नहीं है और शाम देर से ही घर लौटेंगे ,और मैं भी बच्चों को लेकर अपने भाई के पास गाजियाबाद जा रही हूं तो आप परेशान ना होना आपकी भेजी हुई राखी मुझे मिल चुकी है।
फिर कभी मिलने का कार्यक्रम बनाते हैं।
सुधा की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली,वह सोच रही थी कि भाभी भैया उसे इस बार फोन कर राखी पर जरूर बुलाएंगे। इसीलिए उसने इस बार राखी नहीं भेजी थी सिर्फ भाभी का मन जानने के लिए झूठ- बोल दिया था कि मैने स्पीड पोस्ट से राखी भेजी है ।
बहुत ही उदास मन से खुद अपने बचपन की यादों में खो गई और बार-बार यही सोच रही थी कि भैया भाभी क्या विदेश से आने के बाद इतना बदल गए हैं।

— जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया

जय प्रकाश भाटिया जन्म दिन --१४/२/१९४९, टेक्सटाइल इंजीनियर , प्राइवेट कम्पनी में जनरल मेनेजर मो. 9855022670, 9855047845