मुंशी प्रेमचंद: यथार्थ के दीप, विद्रोह की लौ और आदर्श का आलोक
जब भारत की आत्मा को शब्द देने का प्रयास किया गया, तो वह या तो धर्म के आलंबन में ढलती थी या क्रांति की पुकार में, कभी वह ग्राम्य जीवन की धूल बनकर आँखों में चुभती थी, और कभी आदर्शों की मृदुल वाणी बनकर हृदय को द्रवित करती थी। इन समस्त धाराओं का एकत्रित रूप यदि कहीं मिलता है, तो वह मुंशी प्रेमचंद के साहित्य में मिलता है। वे केवल लेखक नहीं थे, एक युगद्रष्टा थे – उन्होंने कलम से वह कर दिखाया जो तलवारें भी नहीं कर पातीं। जब मुंशी प्रेमचंद ने कलम उठाई थी, तब भारत गुलामी की बेड़ियों में जकड़ा था, गाँव अंधविश्वास में डूबे थे, किसान कर्ज़ और जमींदारों के बोझ से टूट रहे थे, और स्त्रियाँ चौखट के भीतर अपने अस्तित्व को तलाश रही थीं। उन्होंने जो लिखा, वह केवल शब्द नहीं, समय की सच्चाई थी। उनकी कहानियों में जो किसान था, जो नौजवान था, जो शिक्षक, सेवक या स्त्री थी – वह सब भारत की आत्मा का प्रतिबिंब थे।
आज जब हम 21वीं सदी के युवा की बात करते हैं – मोबाइल, तकनीक, इंटरनेट और वैश्वीकरण से जुड़ी एक पीढ़ी – तब भी प्रेमचंद की कहानियाँ हमारे सामने एक दर्पण की तरह खड़ी हो जाती हैं। यह सच है कि समय बदल गया है, लेकिन संवेदनाएँ, संघर्ष और प्रश्न – आज भी वैसा ही कुछ कहते हैं, जैसा प्रेमचंद ने सौ वर्ष पहले कहा था।
मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ। नाम था धनपत राय। जीवन की पहली ही पाठशाला थी – निर्धनता, संघर्ष और उपेक्षा। पिता एक मामूली कर्मचारी थे। मां का साया बचपन में ही उठ गया और बालक धनपत को आत्मनिर्भरता के आकाश की ओर ठोकरों से धकेला गया।आरंभ में उर्दू में “नवाब राय” के नाम से लिखना शुरू किया। किंतु जब ब्रिटिश शासन को उनकी कहानियाँ असहज करने लगीं, तो उन्होंने “प्रेमचंद” नाम धारण किया – और यही नाम आगे चलकर हिंदी कथा–साहित्य का पर्याय बन गया।उनका जीवन स्वयं एक कथा था – एक ऐसा कथा-पाठ, जिसमें स्याही नहीं, पसीना और आंसू थे। अध्यापन से लेकर संपादन तक, नौकरी से लेकर स्वतंत्र लेखन तक – उन्होंने हर मोर्चे पर स्वयं को आदर्शों की अग्नि–परीक्षा में डाला। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ केवल कल्पना की उड़ान नहीं, यथार्थ का पथ हैं।
प्रेमचंद के लेखन की एक स्पष्ट धारा आदर्शवाद की है – एक ऐसा आदर्शवाद, जो न केवल पाठक को प्रेरणा देता है, बल्कि उस समय के समाज को एक नई दिशा भी दिखाता है।उनके उपन्यास “सेवासदन”, “प्रेमाश्रम” और “निर्मला” इस आदर्शवादी युग के दर्पण हैं। ‘सेवासदन’ में उन्होंने नारी जीवन की शुचिता, सामाजिक दबावों और स्त्री की गरिमा को नई परिभाषा दी। यहाँ नायिका सुग्गी केवल पापिनी नहीं, वह प्रायश्चित की अग्नि में तपकर उन्नत चेतना का प्रतिरूप बनती है।प्रेमचंद का आदर्शवाद कोरी कल्पना नहीं, बल्कि वह मानवीय आकांक्षा है जो संघर्ष में भी अपनी गरिमा नहीं छोड़ती। “गोदान” का होरी इसी आदर्श का जीता-जागता रूप है – वह मर जाता है, पर ईमान नहीं छोड़ता। प्रेमचंद का आदर्शवाद संघर्षशील है, संतुलित है, और आत्मबल से संपन्न है।हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कभी कहा था – “भारतीय साहित्य तब तक जीवित है, जब तक उसमें मानवता का विश्वास जीवित है।” प्रेमचंद का आदर्शवाद इसी विश्वास का नाम है।
प्रेमचंद हिंदी कथा-साहित्य में यथार्थवाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। उनकी रचनाएँ केवल कहानी नहीं, समाजशास्त्र की जीवित प्रयोगशाला हैं। उन्होंने जो देखा, उसे ज्यों का त्यों नहीं, बल्कि गहराई और आत्मीयता के साथ प्रस्तुत किया।“कफन” कहानी को लीजिए – यह कहानी केवल बाप-बेटे के पतन की कथा नहीं, बल्कि वंचित वर्ग की मनोविज्ञानिक त्रासदी है। वह भूख का क्रंदन है, जो ईश्वर, धर्म और नैतिकता – तीनों को चुनौती देता है।“पूस की रात” में जब हल्कू अपनी खेती के लिए कंबल की बलि दे देता है, तो यह एक शोषण व्यवस्था की मार्मिक व्याख्या बन जाती है। वहीं, “गोदान” में पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था का यथार्थपूर्ण चित्रण है – जिसमें महाजन, जमींदार, पंडित, डाक्टर, स्त्रियाँ और किसानों की त्रासदी है।प्रेमचंद का यथार्थवाद कभी नीरस या निष्ठुर नहीं होता। वह सहानुभूति का रंग लेकर आता है। हजारीप्रसाद द्विवेदी की ही तरह, वह हमें बताता है कि यथार्थ की स्वीकृति ही परिवर्तन की पहली शर्त है।
प्रेमचंद की रचनाओं में एक और स्वरस्रोत है – विद्रोह। यह विद्रोह तलवार का नहीं, कलम का है; यह वाणी का नहीं, चेतना का विद्रोह है। यह उस समाज के विरुद्ध है जो अन्याय को नियम मानता है, और उस परंपरा के विरुद्ध है जो मनुष्यता को कुचलती है।“सज्जनता का दंड”, “नमक का दरोगा”, “ठाकुर का कुआँ”, “बड़े घर की बेटी” जैसी कहानियाँ इस विद्रोही स्वर की प्रतिध्वनि हैं।‘नमक का दरोगा’ के पांडे जी अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ खड़े होते हैं। वे स्वाभिमान की रक्षा करते हैं – और यहीं प्रेमचंद का विद्रोह मुखर होता है।‘ठाकुर का कुआँ’ में दलित स्त्री घीसू कुएँ पर पानी लेने जाती है – यह एक सामाजिक क्रांति की चुप आहट है। प्रेमचंद बिना उद्घोष किए, समाज की जड़ता को तोड़ते हैं।उनका विद्रोह कभी “शोर” नहीं मचाता, वह हृदय को झकझोरता है। द्विवेदीजी की शैली में कहें तो – “प्रेमचंद ने साहित्य में वाणी को नहीं, विवेक को केंद्र में रखा।”प्रेमचंद के लिए लेखन केवल साहित्यिक कार्य नहीं था – वह राष्ट्रसेवा थी। उन्होंने कभी कहा था – “हमारा साहित्य वह होना चाहिए जो मनुष्य को ऊँचा बनाए।”“जंगल की कहानी”, “ईदगाह”, “बेटों वाली विधवा”, “पंच परमेश्वर” – ये केवल भावनाओं की कहानियाँ नहीं, ये सांस्कृतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना हैं। उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता, स्त्री-सम्मान, वर्ग-संघर्ष और जातिवाद जैसे मुद्दों को बड़ी सरलता से प्रस्तुत किया।उनका उपन्यास “रंगभूमि” का सूरदास अंधा है, पर दृष्टिसंपन्न चेतना का प्रतिनिधि है – वह पूँजीवाद के खिलाफ अपनी सच्चाई की आँख खोलता है।
प्रेमचंद का साहित्य इसलिए इतना सजीव है क्योंकि वह अनुभव की कोख से जन्मा है। उन्होंने गरीबी देखी, अपमान झेला, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया। वे सामान्य भारतवासी के दुःख-दर्द को भीतर तक जीते थे।उन्होंने अपनी पत्नी शिवरानी देवी के साथ जीवन को साहित्यिक संवाद में बदला। एक स्थान पर उन्होंने कहा – “मुझे गद्य में कविता लिखनी है।” यह वही कविता है जो उनके साहित्य में कण-कण में झलकती है।वे “हंस” पत्रिका के संपादक रहे। “जागरण”, “माधुरी” से जुड़े रहे। पर कभी समझौता नहीं किया। अंतिम दिनों में टी.बी. से पीड़ित होकर भी वे लेखन करते रहे – और “मंगलसूत्र” अधूरा छोड़कर इस संसार से विदा हो गए।मुंशी प्रेमचंद केवल साहित्यकार नहीं, वे साहित्य के लोकनायक थे। उन्होंने न तो तटस्थता का मुखौटा पहना, और न ही संघर्ष से मुँह मोड़ा। वे न तो केवल क्रांतिकारी थे, न ही केवल भावुक। वे उस संपूर्णता के प्रतीक थे, जो भारतीय आत्मा के तीन आधारों – यथार्थ, आदर्श और विद्रोह – में संतुलन बिठा सकती थी।द्विवेदीजी ने कहा था – “साहित्य वह दीप है जो अंधकार में भी मार्ग दिखाता है।” प्रेमचंद वह दीप थे, जो आज भी अंधकार में जलता है – प्रेरणा, आत्मबल, और मानवीय गरिमा का प्रतीक बनकर।
— आकांक्षा शर्मा
