लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 17)
जब सभी आगन्तुक यथास्थान बैठ गये, तो ऋषि भरद्वाज ने श्री राम के प्रति स्नेह होने के कारण भरत जी से कहा- “भरत! तुम तो अब राजा हो। तुम्हें यहाँ आने की क्या आवश्यकता पड़ गयी? मुझे सब बताओ। तुम्हारे पिता ने तुम्हारी माता के कहने से निरपराध श्री राम को पत्नी सहित चौदह वर्षों की दीर्घ अवधि के लिए वन में भेज दिया है। कहीं तुम छोटे भाई लक्ष्मण सहित उनका अनिष्ट तो नहीं करना चाहते हो, ताकि तुम अकण्टक राज्य भोग सको?”
जो शंका निषादराज गुह के मन में उठी थी, वही शंका मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज के मन में भी उत्पन्न हुई थी, जैसा कि स्वाभाविक है। उन्होेंने अपनी शंका सीधे वशिष्ठ जी और भरत जी के सामने प्रकट करने में कोई संकोच नहीं किया।
मुनि भरद्वाज जी की यह बात सुनकर भरत जी के नेत्रों में जल भर आया। वे लड़खड़ाती वाणी में बोले- “भगवन्! यदि आप पूज्यपाद भी मुझे ऐसा ही समझते हैं, तो मैं हर तरह से मारा गया। विश्वास कीजिए कि श्री राम के वनवास में मेरा कोई दोष नहीं है, इसलिए मुझसे ऐसी कठोर बातें मत कीजिए। मेरी माता ने जो कुछ कहा और किया है, मुझे वह स्वीकार नहीं है। मैं तो श्री राम को प्रसन्न करके उन्हें अयोध्या में लौटा लाने के लिए जा रहा हूँ। मेरे ऊपर कृपा कीजिए। मुझे बताइए कि श्री राम कहाँ पर मिलेंगे।”
तब वशिष्ठ आदि पुरोहितों ने भी कहा कि इसमें भरत जी का कोई दोष नहीं है, आप इन पर प्रसन्न हों। इससे भरद्वाज जी की सारी शंका दूर हो गयी। तब उन्होंने प्रसन्न होकर भरत जी से कहा- “वत्स! तुम्हारे मन की बात मैं जानता हूँ। फिर भी ऐसा इसलिए कहा कि तुम्हारा विचार दृढ़ हो जाये। तुम श्रेष्ठ रघुकुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारी कीर्ति फैलती रहे। मैं श्री राम का पता जानता हूँ। वे चित्रकूट में निवास करते हैं। मेरी इच्छा है कि तुम अपने मंत्रियों सहित आज रात्रि यहीं विश्राम करो। कल प्रातः उस स्थान की यात्रा करना। मेरे बटुक तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे।” भरत जी ने “ऐसा ही हो, भगवन्!” कहकर इसे स्वीकार कर लिया।
फिर भरद्वाज जी ने उनसे कहा कि तुम अपनी सेना को भी यहाँ बुला लो। उनके लिए आश्रम में भोजन और विश्राम की व्यवस्था करके मुझे प्रसन्नता होगी।” इस पर भरत जी ने माताओं और सेना सहित सभी को वहीं आश्रम में बुला लिया। तीनों माताओं ने आकर ऋषि भरद्वाज के चरणों में अपना शीष झुकाया। भरत जी ने उनका परिचय दिया। इस पर ऋषि प्रसन्न हो गये। उन्होंने सभी को आशीर्वाद दिया। तत्पश्चात् उन्होंने अपने शिष्यों के माध्यम से सभी के लिए विश्राम और आहार की उत्तम व्यवस्था कर दी, जिससे सभी सुखपूर्वक वहाँ रहे। इतना उत्तम सत्कार पाकर अयोध्यावासी अपने भाग्य को सराहने लगे।
रात्रि सुखपूर्वक बीत जाने पर प्रातःकाल जाने की आज्ञा लेने के लिए महर्षि भरद्वाज के पास गये। महर्षि उस समय दैनिक हवन कर रहे थे। हवन सम्पन्न होने पर उन्होंने भरत जी को हाथ जोड़े हुए खड़े देखा, तो कहा- “निष्पाप भरत! क्या तुम्हारी रात यहाँ सुख से बीती है? तुम्हारे साथ के सब लोग संतुष्ट तो हैं?”
भरत जी ने उनको प्रणाम किया और कहा- “भगवन्! मैं सम्पूर्ण सेना और नागरिकों सहित यहाँ सुखपूर्वक रहा हूँ। अब मैं श्री राम के पास जाने के लिए आपसे आज्ञा लेने आया हूँ। मुझे वहाँ तक पहुँचने का मार्ग बताइए।”
महर्षि ने बड़े स्नेह से उनकी ओर देखते हुए कहा- “भरत! यहाँ से चित्रकूट पर्वत की दूरी दक्षिण दिशा में लगभग तीस कोस है, जहाँ बड़े सुन्दर और रमणीय वन तथा झरने हैं। उसके उत्तरी किनारे पर मंदाकिनी नदी बहती है। तुम्हें उस नदी और पर्वत के बीच श्री राम की कुटी दिखाई देगी। वे दोनों भाई उसी कुटी में निवास करते हैं।
वहाँ जाने के लिए पहले तुम्हें यमुना नदी पार करनी होगी। उसकी गहराई अधिक नहीं है, परन्तु वेग बहुत अधिक है। इसलिए सावधानी से नदी पार करना। इसके लिए तुम्हें नावें उपलब्ध नहीं होंगी। स्वयं बेड़े बनाकर उनके सहारे नदी पार करनी होगी। यमुना पार करके तुम दक्षिण की ओर चलना। कुछ आगे जाकर तुम्हें दो मार्ग मिलेंगे। उनमें से बायें मार्ग से तुम शीघ्र उनके पास पहुँचोगे।”
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद कृ. 4, सं. 2082 वि. (13 अगस्त, 2025)
