गीतिका/ग़ज़ल

इंक़लाब का आलाप

गुलशन में क्यों है ख़्वाब अधूरा-सा आलाप,
सदियों से सुनते आए इंक़लाब का आलाप।

आज़ादी आई थी तो रोशन थे हर चिराग़,
अब भी अँधेरों में है हिसाब का आलाप।

शहरों में चकाचौंध, मगर गाँव में अँधियारा,
हर कोने से उठता है किताब का आलाप।

भूख और बेबसी ने दबा दी है हर सदा,
रोटी से पहले क्यों हो शबाब का आलाप?

बराबरी के सपनों पे अब भी धूल जमी,
सच में कहाँ है पूरा हिसाब का आलाप।

मज़लूम की आवाज़ को सुनते नहीं शासक,
महलों में गूंजे बस जनाब का आलाप।

‘प्रियंका’ ये सच है, अधूरा है गीत अपना,
पूरे जहाँ में फैले आज़ाद का आलाप।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh