कविता

स्वतंत्रता न बने स्वच्छंदता

आजादी के मायने क्या हैं,
जीवन हो ओजपूर्ण बयार,
ओज-बिना जीना भी क्या जीना,
ओजहीनता पराधीनता का सार।

आधुनिक बनो सोच से,
भूलो मत अपने सुसंस्कार,
ये ही तो हैं अनमोल थाती,
विस्मित है सारा संसार।

जीवन की सुरम्यता बनी रहे,
स्नेह-प्रेम की सरिता बहे,
शिक्षा की आड़ में फूहड़ न बनें,
मानवता बरकरार रहे।

प्रेममय हो अपना परिवार,
सपने सबके हों साकार,
पद-पढ़ाई का घमंड न हो,
उद्दंडता न पाए आकार।

बेटे-बेटी में रहे समानता,
स्वतंत्रता न बने स्वच्छंदता,
सोच आधुनिक भले ही हो,
बनी रहे पर आध्यात्मिकता।

— लीला तिवानी

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244