आजादी है अनूठे हर्ष का एहसास
आजादी है अनूठे हर्ष का एहसास,
प्रकृति की के दुःख-दुविधा-कष्ट हरें,
वक्त का तकाजा है अब पत्थर ही बोलेंगे,
दिलों से कह दो व्यर्थ की गुफ्तगू बंद करें!
बोलने की आजादी नहीं है विवादित बोल,
आजादी नहीं है ईर्ष्या-वैर-द्वेष का सुतार,
आजादी व्यर्थ की खींचतान-सर फुटौव्वल नहीं,
कहती है व्यथित मन की व्यथित पुकार।
बिना बंधनों के आजादी है निरी निरंकुशता,
अधिकारों के साथ करना कर्त्तव्यों का पालन,
तभी अक्षुण्ण रहेगी अभिव्यक्ति की आजादी,
अव्यवस्था के नापाक दाग से कलुषित न हो दामन।
भाषा की गुलामी की जकड़न से रहें दूर,
अन्याय की धारों-जंजीरों से न रहे प्यार,
अराजकता हटे, आत्मविश्वास रहे भरपूर,
सबको मिले न्याय, सुखमय जीवन का अधिकार।
— लीला तिवानी
