साहित्य के सौदागर
क्यों छुपाते हो मुखड़ा अपना,
प्रोफ़ाइल की कड़ी दीवारों में?
क्या सृजन इतना निर्बल है,
कि उजाले में टिक न सके?
तुम्हारे शब्द नहीं,
बेगुनाह रचनाकार की वेदनाएँ हैं—
जो तुमने चुराई हैं,
उसके सरल मन से,
उसकी नितांत निस्संग रातों से।
उसकी आँसुओं की बूंदें,
तुम्हारी किताब के पन्नों में चमक रही हैं,
पर नाम कहीं और है,
सम्मान किसी और का।
ओ शब्दों के सौदागर!
याद रखो—
साहित्य कोई मेला नहीं,
जहाँ भाव बिकते हों और श्रेय बाँटे जाते हों।
यह तो आत्मा की तपस्या है,
जो छल की धूल से मलिन नहीं होती।
सच्चा रचनाकार,
भले मौन रहे, भूला रहे,
पर उसकी व्यथा से उपजा सत्य,
युगों तक गूंजता रहेगा—
और तुम्हारे बंद दरवाज़ों के भीतर का अंधकार
एक दिन स्वयं तुम्हें निगल जाएगा।
— डॉ सत्यवान सौरभमि
