गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आज लोरी अब गाकर सब भुला दो मुझको।
एक बच्चा ही समझ देख सुला दो मुझको।।

साँस पर साँस लिए भार अभी ऐंठी है।
कब रुख़सत अब हो सोच बता दो मुझको।।

ज़िंदगी आज तलक जी सब उम्मीदें रख।
साज – संगीत सजा आज मज़ा दो मुझको।।

मैं तुम्हारी रहती हूँ रहना जन्मों तक।
सोच रख और कभी भी न गिरा दो मुझको।।

दर्द हद से बढ़ता आज नहीं सह सकता।
( कोई मेरी ही ग़ज़ल आ के सुना दो मुझको।। )

आज अरमान रहा देख न कोई बाकी।
प्रभु- चरणदास अभी सोच बना दो मुझको।।

चैन-आराम मिले ही अब हर पल सोचूँ।
आज जन्नत की डगर पर ही चला दो मुझको।।

ये अमानत रब की है जानो बातें ये।
एक दुल्हन की तरह ही सजा दो मुझको।।

गिन रही हूँ सुन अंतिम धड़कन देखो अब।
सोच कैसी लो समझ दीप बुझा दो मुझको।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’