लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 23)
उधर भरत जी का सन्देश पाकर गुरु वशिष्ठ जी के साथ आती हुई तीनों माताएँ श्री राम को देखने की इच्छा से उनके आश्रम का अनुमान लगाकर उसकी ओर पैदल ही चलीं। उनको मार्ग का ज्ञान बिल्कुल नहीं था, इसलिए धीरे-धीरे सीधे दक्षिण दिशा में चलते हुए वे सभी मंदाकिनी नदी के तट पर पहुँच गये। वहाँ बने हुए एक स्नान घाट को देखकर माता कौशल्या जी ने अनुमान लगाया कि यहीं पर श्री राम और लक्ष्मण जी स्नान करने आते होंगे और यहीं से लक्ष्मण जी श्री राम और सीता जी के लिए जल भरकर ले जाते होंगे। उन्हें यह सोचकर बहुत दुःख हुआ कि सदा सुविधाओं में पले राजकुमार लक्ष्मण जी को वन में पानी भरने जैसा छोटा काम भी करना पड़ रहा है।
वे सुमित्रा जी से कहने लगीं- ”सुमित्रे! जो श्री राम कभी किसी को कष्ट नहीं देते, वे निरपराध ही राज्य से निकाल दिये गये हैं और वे अनाथ की तरह वन में निवास करते हैं। तुम्हारे परिश्रमी पुत्र लक्ष्मण स्वयं यहाँ आकर श्री राम और सीता के लिए जल भरकर ले जाते होंगे। कितने दुःख की बात है कि सदा सुविधाओं में पले-बढ़े राजकुमार को जल भरने जैसा कार्य करना पड़ रहा है। यद्यपि ऐसा करने से उनकी कोई निन्दा नहीं करेगा, क्योंकि इस कार्य का उद्देश्य पवित्र है। अब श्री राम को यहाँ से लौट चलना चाहिए, ताकि उन्हें अब और वन के कष्ट न सहने पड़ें।“ सुमित्रा ने सिर हिलाकर इस पर अपनी सहमति प्रकट की।
वहीं थोड़ी दूर पर उन्हें श्री राम द्वारा अपने पिता को दिया गया पिंडदान दिखाई दिया, जो इंगुदी के फल को पीसकर बनाया गया था और किसी वृक्ष के पत्तों पर रखा हुआ था। उन्हें यह सोचकर बहुत शोक हुआ कि नाना प्रकार के अन्न से बने खाद्य पदार्थों को भोगने वाले महाराज को इंगुदी के फल का पिंड खाना पड़ेगा। ऐसा विचार आने पर वे शोक से विलाप करने लगीं और अन्य रानियों से कहने लगीं- ”बहनो! देखो, श्री राम ने यहाँ अपने यशस्वी पिता के लिए विधिपूर्वक पिण्डदान किया है, जो इंगुदी के फलों को पीसकर बनाया गया है। सदा नाना प्रकार के भोगों को भोगने वाले महाराज के लिए ऐसा पिंडदान होना कितने दुर्भाग्य की बात है। इन्द्र के समान प्रतापी महाराज दशरथ को इंगुदी फल का पिंड खाना पड़ेगा इससे अधिक शोक की बात क्या हो सकती है? इस दुःख से मेरा हृदय फटा जा रहा है।“ यह कहकर वे फिर रोने लगीं, जिस पर अन्य रानियों और गुरु वशिष्ठ जी ने उनको सांत्वना दी।
फिर उन्होंने मंदाकिनी तट से वन में जाते हुए पगचिह्न देखे और अनुमान लगाया कि यह मार्ग श्री राम की कुटी की ओर ही जाता होगा। इसलिए वे उन पगचिह्नों का पीछा करते हुए वन में चलने लगे। फिर वे सभी कुछ देर में ही श्री राम के आश्रम पर पहुँच गये। वहाँ उन्होंने तपस्वी जीवन जीने वाले श्री राम को देखा। उन्हें देखकर सभी माताएँ शोक से विलाप करने लगीं। नरश्रेष्ठ श्री राम अपनी माताओं को आते देखकर अपने आसन से उठ खड़े हुए और बारी-बारी से उन्होंने कैकेयी सहित सभी माताओं के चरण स्पर्श किये। सभी माताओं ने वात्सल्य से उनकी पीठ पर हाथ फेरा।
श्री राम के बाद लक्ष्मण जी ने भी सभी दुखिया माताओं के चरणों का स्पर्श किया। माताओं ने उनकी पीठ पर भी स्नेह से हाथ फेरा। अन्त में आँखों से आँसू बहाते हुए सीता जी ने तीनों सासुओं के चरणों में प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ी हो गयीं। रोती हुई महारानी कौशल्या ने वनवास के कारण दुर्बल हो गयीं सीता जी को उसी प्रकार अपने हृदय से लगा लिया, जैसे कोई माता अपनी बेटी को लगा लेती है।
उसी समय श्री राम ने अपने गुरु वशिष्ठ जी के दोनों चरण पकड़ लिये और आशीर्वाद पाकर उनके साथ ही पृथ्वी पर बैठ गए। तब तक भरत जी के साथ आये हुए मंत्री, ब्राह्मण, पुरवासी आदि सभी लोग भी वहाँ तक पहुँच गये और आवश्यक अभिवादन के पश्चात् आज्ञा पाकर श्री राम के निकट ही यथायोग्य स्थानों पर बैठ गये।
उस समय श्री राम आदि सभी भाई अपने पिताजी महाराज दशरथ के शोक में बैठे हुए थे। इसलिए वे महाराज के गुणों का ही स्मरण और चर्चा कर रहे थे। इसके अलावा उनमें और कोई चर्चा नहीं हुई। रात्रि हो चुकी थी, इसलिए सबके लिए वहीं यथायोग्य शयन की व्यवस्था कर दी गयी। अपने स्वजनों से घिरे हुए श्री राम की वह रात्रि महाराज दशरथ के निधन के शोक में ही व्यतीत हुई।
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 2, सं. 2082 वि. (25 अगस्त, 2025)
