पानी( जल) का महत्व एंव समस्याएं
बढ़ती जन संख्या तथा विभिन्न पहलुयों द्वारा इस का दुरउपयोग पानी का स्तर कम कर रहा है। पानी का प्रयोग जीवन में प्रत्येक तत्वों पर किया जाता हैं। घरेलु रसोई से लेकर बाहरी कार्या में भी पानी की एक विशेष महता है। पानी मानव की जिं़दगी के अंतिम सांसों तक साथ देता है और पानी एक सच्चा मित्र है। पानी ही भगवान का दूसरा रूप है। इसीलिए पानी की पूजा होती है। विज्ञान से लेकर धार्मिक, घरेलु, समाजिक, व्यवहारिक कार्यो-समागमें में पानी की विशेष अहमियत युग-युगांत्र से चलती आ रही है। कृषि, काएनात तथा मानव की खूबसूरती के लिए पानी की मुख्य भूमिका है।
जल संसाधन के नियोजक, विकास तथा प्रबंधन को राष्ट्रीय स्तर पर संचालित करने के लिए तुरंत जरूरत को देखते हुए सन् 1986 में अब तक कई बार विभिन्न जल विशेष विज्ञानियों की निगरानी में जल नीति की रूप रेखा तैयार की गई। देश की प्रथम जलनीति 1986 में तथा दूसरी सन् 2002 में लागु की गई। परंतु इन जल नीतियों के बावजूद कई खामियों के कारण जल स्तर में गिरावट का सिलसिला जारी रहा। नदी नाले सूखने के कारण, जलप्रदूषण बढ़ने के कारण, पहाड़ी नदियों में गंदला बहन रोड़ होने के कारण जल प्रदूषण बढ़ने लग पड़ा। भारत की प्रसिद्ध नदियों में गंदगी फेंकने के कारण, अस्थियां प्रवाह के कारण, धार्मिक रीति रिवाजों के कारण, ग्रामीण-शहरी कूढ़ा कर्कट फैकने के कारण आदि पानी में गंदगी तथा गार फैलनी शुरू हो गई। इसी वजह के कारण समय की मांग को रखते हुए जल नीति की ज़रूरत महसुस की गई तां कि नदियों-नाले के जल में गंदलेपन को रोकने के लिए ज्यादा से ज्यादा जल संयोजन का जा सके। सन् 2012 में भारत सरकार के जल संसाधन मंत्रालय के एक और नई जलनीति तैयार की जिस को जल-नीति 2012 का नाम दिया गया।
राष्ट्रीय जलनीति के अनुसार जल संसाधन, नियोजन, विकास तथा प्रबंधन राष्ट्रीय दृष्टिकोण से संचालित किए जाने की जरूरत है। केन्द्र तथा राज्य स्तर पर सूचना प्रणाली स्थापत की जाए। केन्द्र तथा राज्य स्तर की एंजंसियां स्क्तिशाली एक नेटवर्क की भूमिका निभाएँ। उपयोग जल संसाधनों को और ज्यादा ऊपर उठाने के लिए एक नदी को दूसरी नदी से जोड़ा जाए। समुंद्र जल के खारे पानी को दूर करने के लिए विधियों के साथ-साथ बारिश के पानी के समूचे ढंग से शुद्ध पानी के योग बनाया जाए। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर खोज तथा विकास को और उत्साहित करने की ज़रूरत है। हाईड्रोलाजीकल ईकाई के लिए जल संसाधन विकास तथा प्रबंधन की योजना तहित नदियों घाटियों के संगठनों को स्थापित किया जाना चाहिए। जिस जगह पर पानी की कमी है उस क्षेत्र को नदी-नालों से जोड़ा जाए। जल वितरण प्राथमिकता सबसे पहले पीने वाले पानी से, फिर सिंचाई, इस के बाद पन बिजली, कृषि तथा गैर कृषि उद्ययोगों आदि को क्रम में करना चाहिए। पानी की दुरूउपयोगिता को रोका जाए। पूर्नस्थापित तथा पुर्नवास पर योजना बद्ध ढंग से काम किया जाए तां कि इस का लाभ प्रभावित लोगों को भी मिल सके।
स्तर वाले पानी और धरती निम्न पानी की गुणवंत्ता पर निगरानी रखी जाए। आविसकृत पानी को प्राकृतिक पानी में मिलाने की कोशिश की जाए। पानी के स्तर के लिए इस के बचाव के लिए प्रचार, प्रासार, शिक्षा, दंड तथा मान सामान के ज़रिए जल बचाओ चेतना को उत्साहित करना चाहिए।
बांटलिंग प्लंाटस की ज़्यादा खप्त करके भी बहुत सारा (लाखोंटन) पानी फजूल ही जाता है। हिमाचल प्रदेश में पानी को खेती कृषि आदि के लिए प्रयोग में लाया जाता है। धरती के नीचे गिरते पानी को बचाने के लिए सरकारों को और कई उपराले सुघढ़ता से करने चाहिए। वर्षा के पानी का संगृह करके उचित प्रयोग में लाना भी एक बढ़िया ढंग है। पानी की शुद्धिकरण के लिए कई तरह के परम्परागत तथा आधुनिक प्रयोग सार्थक सिद्ध हो सकते हैं।
भारत सेम (सिल्ली) वाले क्षेत्र गंदले दरियाई क्षेत्र, कल्लरी क्षेत्र, गंदले नालों वाले क्षेत्र में लाखों लोग बीमारियों का शिकार हो रहा है क्योंकि उन पिछड़े क्षेत्र में साफ-स्वच्छ पानी की बहुत कमी है। विशेष कर के पंजाब में ही शुद्ध पानी न मिलने के कारण हज़ारों लोग कैंसर, गुर्दे के रोग, पेट की बीमारियाँ आदि के शिकार हो रहे हैं। अनेकानेक लोग मौत के मुँह में जा चुके हैं। सरकार की ओर से अस्पताल तो खोले रहे हैं परन्तु, शुद्ध पानी की व्यवस्था नहीं की जा रही। सरकार की और से शुद्ध पानी का अबी तक मुकम्ल, सही योजना वद्ध, आविष्कार पूर्वक ढंग से कोई निष्कर्ष नहीं निकलता। अस्पतालों की जगह पर लोगों के शुद्ध पानी मिले। शुद्धी करण वाली पानी की टैंकियों का प्रबंध प्रत्येक गांव में हो। कुछ नहीं तो पानी फिल्टर करने वाले उपकरण सस्ते रेटों में घर-घर मुहैया करवांए जाएं।
भौतिक माप के अनुसार पीने वाले साफ पानी शीतल, गंध रहित होना चाहिए। नैतिक माप के अनुसार शुद्ध पानी में काई गंदला तत्व नहीं होना चाहिए। अशुद्ध पानी में कैलिसम, सलफेट, लोहा मैगज़ीन, तांबा, जिंक, शीश, पाश तथा अन्य रासायणिक पदार्थ आदि पाए जाते हैं। अगर कोई रोग फैलता है तो उस के रोगाणु, पानी में धुल कर कई बीमारियों को जन्म देते है।
कुएँ, तालाबों, नालों, बौलियों आदि ठहरे किस्म के पानी गंदले होने के कारण साफ-स्वच्छ पानी को प्रदूषित कर देते हैं। भविष्य को भयंकर भौतिक बीमारियों का शिकार होना पड़ेगा तथा होना पड़ रहा है। भारत सरकार तथा राज्य सरकारे कई शुद्ध जल योजनाएँ चला रही हैं परन्तु बड़े स्तर खर्च आने की वजह से अधुरी हैं। भारत जलवायु की दृष्टि से मानसूई प्रदेश होने के कारण वर्ष के तीन या चार माह ही वर्ष होती है। शेष माह वर्षा न होने के कारण बहुत सारे भागों में धरातलीय जल की कमी रहती है।
उतर के तटी मैदानों में भूमिगत पानी के विशाल भंडार पाए जाते हैं देश के दूसरे मांगों में पानी की बहुत कमी पाई जाती है। अभी तक देश के प्रत्येक गांव में सुरक्षित पीने वाले पानी की व्यवथ्या नहीं हो पाई है। देश में आज भी पानी लेने के लिए लोगों को दूर दराज पैदल चल कर पानी लाना पड़ता है। संपूर्ण जल संसाधन को अध्ययनों में अनेक दृष्टिकोणों, जैसे नदी नाले, निकास, प्रणाली, बाढ़-सूखा की समस्या, सिंचाई परियोजना आदि की सख़त जरूरत है।
धरती ऊपर जल निकास का बहुत महत्व हैं ऊँचे भागों से निम्न भागों को जाते पानी का अच्छा प्रबंध। कृषि, व्यापार, धार्मिक पुजा तथा क्षेत्रीय प्रबंधन तथा नियोजन में नदियों की भरपुर उपयोगिता है। भारतीय जल निकास प्रणाली के कई प्रयास क्रियारत है।
पंजाब, हरियाणा तथा उतर प्रदेश के भागों में समतल भूमि होने के कारण विकास कार्य नदियां सड़के, पुल, रेल तथा नहर मार्ग के कारण फालतू पानी का निकास पूरी तरह नहीं हो सका।
भारत सरकार ने 1954 में बाढ़ पर नियंत्रण पाने के लिए राष्ट्रीय योजना प्रस्तुत की थी, जिस में दरिआई किनारे पक्के करना, दरिआई मार्गो को बांटना, ऊँचे चबूतरे बनाना, पौधे लगाना, बाढ़ वाले क्षेत्रों का निर्धारिण, बाढ़ सुरक्षा तथा भविष्यवाणी के संकेत देना तथा ढलानों के ऊपर बांध आदि प्रमुख थे।
देखा जाए तो ख़ासकर के एशियन देशों में ही पानी की ज़्यादा समस्याएं हैं। खास कर के भारत में गंदले पानी का प्रदूषण अनवरत बढ़ता जा रहा है। उस की वजह यह है कि कोई भी ठोस कठोर कानून व्यवस्था नहीं है। प्रायः लोग गांवों, शहरों की गलियां, दुकानों आदि का कूढ़ा कर्कट नदी नालों में ही फैंक देते है।
फैक देते है जो नदी को गंदला करता है। भारतीय लोगों पर अवसर पर तुरंत फैसला लेने वाला कानून लागू नहीं होता।
पानी की शुद्धता तथा निकास को सही रूप देने के लिए संतों, महापुरूषों, धार्मिक प्रचारकों को इधर ध्यान देना चाहिए। पानी की शुद्धता को बचाने के लिए बड़े-बड़े धार्मिक अदारों को आगे आना चाहिए क्योंकि ये बढ़िया भूमिका निभा सकते है। क्योंकि उनके पास पैसा (धन) भी है तथा मानव शक्ति की है। धर्माचार्य अपने प्रवचनों के माध्यम से पानी की शुद्धता कम हो रही स्तर की ओर जनता ध्यान आकर्षित करें। स्कूलों-कालिजों में रोज़ एक पीरिअड होना चाहिए तब जा कर यह योजना सार्थिक ढंग से क्रियान्वित हो सकती है।
सरकारों को चाहिए कि पानी के निकास के लिए (BORE-WELL) निकास कूएं लगवाएं, टी. टी. एस. (T.T.S) मीटर का प्रयोग घर-घर मे हो। विकसित देशों ने लघु निकासी कुएं के ज़रिए बेकार पानी, बारिश के पानी तथा बाढ़ के पानी पर नियंत्रण कर रख है। विकसित देशों की सड़को के किनारे किनारे ज़रूरत के अनुसार लघु निकासी कुएं बनवाएं हुए हैं। बारिश आदि का पानी इन बोरों कुओं के ज़रिए भूमि के नीचे चला जाना है। परून्तु यह बहुत महँगा खर्च है जिस के कारण सरकारें इधर ध्यान नहीं देती जब कि भविष्य में इन की सख्त ज़रूरत है।
भारत सरकार ने 1974 में कानूत पारित किया था कि गंदा पानी नदी-नालों में न फैंका जाए परन्तु इस कानून की कौन परवाह करता है? आज भारत के शहर-शहर, गाँव-गाँव में पानी के निकास, शुद्ध पानी के प्रबंध तथा पानी के कम होते स्तर को बचाने की अत्यंत आवश्यकता है।
— बलविंदर बालम
