उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 27)

श्री राम की बात सुनकर भरत जी और अधिक उदास हो गये। अयोध्या से उनके साथ आये हुए सभी लोग दो भाइयों के बीच हो रहे इस विवाद को अवाक होकर देख-सुन रहे थे। वे जानते थे कि श्री राम और भरत जी दोनों ही अपनी-अपनी दृष्टि से सत्य कह रहे हैं। वे नहीं समझ पा रहे थे कि इस जटिल परिस्थिति को कैसे सुलझाया जाये। इसलिए वे सब मौन होकर ही बैठे थे। तब भरत जी ने अपने नगर और जनपद के लोगों की ओर मुख करके उनसे कहा- “आप लोग भैया को क्यों नहीं समझाते?” तब उन लोगों में से कुछ ने कहा- “हम जानते हैं कि आप श्री राम से ठीक ही कह रहे हैं, परन्तु ये भी अपने पिता की आज्ञा के पालन में लगे हैं, इसलिए ये भी ठीक ही हैं। हम इनको लौटाने में असमर्थ हैं।” यह सुनकर भरत जी पूरी तरह निराश होकर बैठे रह गये।

तब श्री राम ने कहा- “भरत! तुम मेरी और इन धर्मात्मा सज्जनों की बातों को सुनकर अच्छी तरह विचार करो।” इस पर भरत जी ने खड़े होकर एक घोषणा-सी करते हुए कहा- “आप सभी लोग मेरी बात सुनें। मैंने न तो कभी पिताजी से राज्य माँगा था और न माँ से ही कभी इसके लिए कहा था। धर्मात्मा श्री राम के वनवास में भी मेरी कोई सम्मति नहीं है। फिर भी यदि इनके लिए पिताजी की आज्ञा का पालन करना अनिवार्य है, तो इनके बदले में मैं ही चौदह वर्ष तक वन में निवास करूँगा।”

भरत जी की यह घोषणा सुनकर सभी अयोध्यावासियों और श्री राम को भी बहुत विस्मय हुआ। उन्होंने सभी को सम्बोधित करते हुए कहा- “सज्जनो! पिताजी ने मुझे जो आज्ञा दी है उसे कोई भी व्यक्ति पलट नहीं सकता। मैं वनवास के लिए किसी को अपना प्रतिनिधि नहीं बनाना चाहता। लेकिन मैं वचन देता हूँ कि मैं चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके राज्य ग्रहण कर लूँगा। तात भरत! अब तुम मेरा कहना मानकर राज्य का पालन करो और पिताजी को असत्य के बन्धन से मुक्त करो।” यह सुनकर अयोध्यावासियों के मन में आशा का संचार हो गया और वे प्रसन्नता से भर उठे।

दोनों धर्मशील और तेजस्वी भाइयों का यह वार्तालाप सुनकर वहाँ आये हुए महर्षियों को भी बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने दोनों राजकुमारों की बहुत प्रशंसा की और भरत जी से कहा- ‘राजकुमार भरत! तुम उत्तम कुल में उत्पन्न हुए हो। तुम्हारे आचार-विचार महान हैं। तुम्हें अपने पिता का स्मरण करके उनको सुख पहुँचाने का ही प्रयत्न करना चाहिए। श्री राम का प्रस्ताव हर प्रकार से उचित है। तुम्हें उनकी बात मानकर अयोध्या का शासन सँभाल लेना चाहिए। इससे श्री राम और तुम भी अपने पिता के ऋण से मुक्त हो जाओगे।“ यह कहकर वे महर्षि वहाँ से चले गये।

भरत जी मानसिक रूप से इस प्रस्ताव को स्वीकारने के लिए तैयार हो चुके थे। फिर भी वे विनम्रता से बोले- “भैया! मैं अकेला इस विशाल राज्य की रक्षा और पालन नहीं कर सकता। आप किसी अन्य सुयोग्य व्यक्ति को इसके पालन का भार सौंप दीजिए। वही इस कार्य को वहन करने में समर्थ हो सकता है।” यह कहकर भरत जी श्री राम के चरणों पर गिर पड़े।

श्री राम ने बड़े स्नेह से उनको उठाया और अपने हृदय से लगाकर कहा- “तात! तुम पूरे भूमण्डल का भी पालन और रक्षा करने में समर्थ हो। इसके अलावा अपने बुद्धिमान मंत्रियों से भी सलाह लेकर सभी कार्य करा सकते हो। तुम अपनी माता कैकेयी से भी सदा अच्छा व्यवहार ही करना।”

यह सुनकर भरत जी ने उनका आदेश स्वीकार कर लिया। फिर सबको आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने अपने पास से दो सुवर्ण भूषित पादुकाएँ निकालीं और श्री राम से कहा- ”भैया! इन पर अपने चरण रखिए।“ श्री राम ने उन पर अपने दोनों पैर रखे और फिर हटा लिये। ऐसा करके उन्होंने वे पादुकायें फिर भरत जी को सौंप दीं।

भरत जी ने उन पादुकाओं को प्रणाम किया और कहा- “भैया! मैं चौदह वर्ष तक इन पादुकाओं की ओर से राज्य का भार सँभालता रहूँगा। मैं भी जटा और चीर धारण करके फल-मूल का आहार करता हुआ नगर से बाहर ही रहूँगा। यदि चौदह वर्ष पूरे होने के अगले ही दिन मुझे आपका दर्शन नहीं मिलेगा, तो मैं जलती हुई अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।”

श्री राम ने “बहुत अच्छा” कहकर इसकी स्वीकृति दी। फिर अयोध्या से आये हुए सभी लोग लौट चलने को तैयार हो गये।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
भाद्रपद शु. 10, सं. 2082 वि. (2 सितम्बर, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com