कविता

अपनी माटी सबको प्यारी

अपने गांव की माटी से जो जुड़ा है रहता
दिल में उसके प्यार का दरिया है बहता
दूर रह कर भी आती है बहुत याद गांव की माटी
यह मैं नहीं ज़माना है कहता

कुछ लोग शहर जा रहे काम की तलाश में
बस गए वहीं भूल कर अपनी माटी और गांव
वह सकूँ शांति शहर में कहाँ है मिलती
वह ठंडी हवा और घने पेड़ों की ठंडी छांव

कोई अपना नहीं शहर में सब हैं अनजान
पड़ोसी हैं लेकिन नहीं कोई जान पहचान
अनजाना शहर है कोई पूछता नहीं
दूसरों से क्या लेना रखते हैं काम से काम

अपने खेतों में दिन रात काम करना
बड़े बड़े पेड़ों पर चढ़ने से नहीं डरना
बौड़ी के पानी से घड़ा भर कर लाना
भेड़ बकरी भैंस गाय का चरागाहों में चरना

पहली बारिश में जब मिट्टी की खुशबू है आती
अनायास अपने गांव की याद है या जाती
शहर की गर्मी में वह जून का महीना
गांव के वह पीपल की छांव एक ठंडक सी दे जाती

गांव में मिलती शुद्ध हवा शहर में बदबू का आलम
दम लगता है घुटने रुकने लगती है सांस
बेचैन रहता है शहर की भीड़भाड़ में मन
गांव की मिट्टी याद आते ही खिल उठता है मन निराश

— रवींद्र कुमार शर्मा

*रवींद्र कुमार शर्मा

घुमारवीं जिला बिलासपुर हि प्र