लघुकथा

मेरा हरसिंगार, मेरा श्रृंगार

ना जाने क्यों, जब भी हरसिंगार की सुवास मेरी साँसों से टकराती है, मेरा मन खिंचा चला जाता है। यह फूल मेरे हृदय को एक अनकही आत्मिक शांति और अलौकिक आनंद से भर देता है। नारंगी डंठल और श्वेत पंखुड़ियाँ मानो आँखों में ठंडक घोल देती हैं।

पिछले वर्ष की शारदीय नवरात्रि की स्मृति आज भी ताज़ा है। अष्टमी का दिन था। मेरा पारिजात का वृक्ष आँगन में खड़ा था, पर उस दिन उस पर फूल मानो रूठ गए थे। मेरी अभिलाषा थी कि माँ भगवती को हरसिंगार के ही पुष्प अर्पित करूँ, परंतु वृक्ष ने बस नाममात्र के फूल दिए। मन बुझा-बुझा सा था। मैं माँ को चूड़ी और सिंदूर अर्पित कर रही थी, तभी अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई।

एक वृद्ध आदिवासी महिला खड़ी थी, हाथ में एक झोला लिए। मुस्कुराते हुए बोली, “बेटा, इसे रख लो… मेरे घर का है।”

जिज्ञासा से मैंने झोला खोला और मेरी आँखें आश्चर्य से फैल गईं,उसमें हरसिंगार के फूल खिले हुए थे, मानो मुस्कुराकर मेरा स्वागत कर रहे हों। उस क्षण मेरा हृदय भावनाओं से भीग गया। यह माँ भगवती का आशीर्वाद था या गिरधर की भेंट—मैं नहीं जानती। परंतु यह अनुभव रोमांच से भरा, अविस्मरणीय और दिव्य था।

उस दिन मैंने महसूस किया कि मेरा हरसिंगार से कोई अद्भुत रिश्ता है चाहे वह शिवली कहलाए, पारिजात या शेफाली वह हर नाम में, हर रूप में, मेरा श्रृंगार है।

— सविता सिंह मीरा

*सविता सिंह 'मीरा'

जन्म तिथि -23 सितंबर शिक्षा- स्नातकोत्तर साहित्यिक गतिविधियां - विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित व्यवसाय - निजी संस्थान में कार्यरत झारखंड जमशेदपुर संपर्क संख्या - 9430776517 ई - मेल - meerajsr2309@gmail.com