लघुकथाएं
- फैसला
पिता ने कहा, “तू घर बैठ जा बेटा, लड़की को नौकरी करने दे। उसकी तनख्वाह ज़्यादा है।”
बेटा चुप रहा। माँ ने पहली बार बेटे के पक्ष में कुछ नहीं कहा। लड़की ने भी नहीं — वो तो बस कमरे में जाकर रोई।
फैसला हो चुका था। लेकिन किसी ने पूछा नहीं कि इस ‘फैसले’ में स्वाभिमान, लिंग समानता, या सपने कहाँ हैं।
दूसरे दिन से बेटा चाय बनाने लगा, और लड़की दोहरी शिफ़्ट में गई। बाहर से सब सही दिख रहा था। लेकिन भीतर कुछ टूट गया था — सबमें।
शाम को बेटे ने पूछा, “क्या मेरे सपने अब सिर्फ़ रसोई तक सीमित रहेंगे?” लड़की ने कहा, “और क्या मेरे सपने अब सिर्फ़ घर की कमाई बनकर रह जाएँगे?” माँ सुन रही थी — और सोच रही थी कि क्या हमने सही किया?
पिता के चेहरे पर संतोष था, लेकिन वह भी भीतर से जानता था कि संतुलन की आड़ में एक पक्ष ने स्वीकृति दी है, और दूसरे ने बलिदान।
- बचे हुए लोग
गाँव के आखिरी छोर पर जो घर बचे थे, वो न स्कूल की सूची में थे, न राशन में।
“आप यहाँ क्यों रुके हैं?” अफसर ने पूछा।
बूढ़े ने जवाब दिया, “क्योंकि हम कहीं गए ही नहीं।”
बस्ती उजड़ चुकी थी। बस कुछ लोग रह गए थे — जिन्हें सरकारी आँकड़े अब ‘अस्तित्वहीन’ मानते थे।
बचे हुए लोग, बस जिंदा थे।
उनके पास अब ना खेती थी, ना रोजगार। पास की नहर सूख चुकी थी, और स्कूल कभी बना ही नहीं था। बीमारी आई तो इलाज नहीं मिला, और बच्चे अब बड़े होकर शहर चले गए।
सरकार की योजनाओं की सूची में उनके नाम नहीं थे, क्योंकि किसी ने दो साल पहले उन्हें ‘पुनर्वासित’ मानकर नाम काट दिए थे।
फिर भी, हर सुबह सूरज उगता था, और वे लोग अपने टीन की छतों के नीचे उम्मीद से बैठ जाते थे — शायद आज कोई आए, शायद कोई पूछे कि “भूख कैसी लगती है जब दुनिया आपको भूल जाए?”
- उपवास
संत ने कहा, “आज हम देश की शुद्धि के लिए उपवास करेंगे।”
एक वृद्ध किसान वहीं बैठ गया। लोग उसे हटाने लगे। उसने कहा, “मैं भी उपवास पर हूँ।”
“क्यों?”
“क्योंकि तीन दिन से कुछ खाया नहीं।”
भीड़ चुप हो गई। संत ने अपनी आँखे बंद कर लीं — आस्था की नहीं, शर्म की।
वह किसान पास के गाँव से आया था। बारिश नहीं हुई, फसलें सूख गईं, कर्ज़ चढ़ा और राशन कार्ड में नाम नहीं मिला। उसने मंदिर में मदद मांगी, तो उसे बताया गया कि आज ‘उपवास’ है — भोजन नहीं मिलेगा।
मंच पर बैठे धर्मगुरु ने उसे देखा और फिर अपना चेहरा मोड़ लिया। टीवी कैमरे उनकी ओर थे, और झूठी मुस्कुराहट जरूरी थी।
उधर किसान ज़मीन पर बैठा रहा — उसके लिए यह ‘उपवास’ नहीं, ज़िंदा रहने की एक त्रासदी थी।
- भगवा स्कार्फ
लड़की ने भगवा रंग का स्कार्फ पहना था। भीड़ ने उसे रोका — “तू किस धर्म की है?”
वो मुस्कुराई — “मैं एक रंग की हूँ।”
हँसी गूंजती रही। किसी ने उसकी जात नहीं पूछी, बस स्कार्फ छीन लिया गया।
फिर उससे आधार माँगा गया, धर्म प्रमाण-पत्र पूछा गया, और कहा गया कि रंगों का अब धर्म होता है।
लड़की चुप रही। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, गुस्सा भी नहीं। वह बस आगे बढ़ गई — बिना स्कार्फ के, लेकिन सिर ऊँचा था।
उसकी माँ ने रात में उससे पूछा, “डरी नहीं?”
उसने जवाब दिया, “नहीं माँ, डर तो तब लगता अगर मैं चुप रह जाती।”
- दस्तख़त
“यहाँ दस्तख़त कीजिए,” अफसर बोला।
बूढ़ा किसान काँपते हाथों से कलम पकड़े खड़ा था।
“मैं पढ़ा नहीं… दस्तख़त कैसे करूँ?”
अफसर ने झुंझलाकर कहा, “अँगूठा लगाइए फिर।”
वो पीछे हटा और बोला — “ज़मीन पर दस्तख़त करने से पहले मैं अपनी मिट्टी से इजाज़त ले लूँ।”
उसके पास 3 बीघा ज़मीन थी, जिस पर अब सड़क बनने वाली थी। मुआवज़ा कम था, लेकिन दस्तख़त कराना जरूरी था।
उसका बेटा शहर में ड्राइवर था, लौट नहीं पाया। बूढ़े ने हल जोतकर ही बच्चों को पाला था। अब उसी ज़मीन पर जबरन अधिग्रहण की बात थी।
वह जानता था — ये दस्तख़त अब सिर्फ़ कागज़ पर नहीं, आत्मा पर होगा।
- खाली बैग
स्कूल खुलते ही प्रधानाचार्य ने भाषण दिया—“सरकार ने मुफ्त किताबें और बैग भेजे हैं। बच्चों की मुस्कान लौटेगी।”
कक्षा तीन में बैठा रोहित मुस्कुरा नहीं रहा था। उसके हाथ में नया बैग था, पर उसमें किताबें नहीं थीं। उसके पिता ने बताया कि उन्हें अभी तक सूची नहीं मिली थी।
टीचर ने पूछा, “होमवर्क कहाँ है?”
रोहित ने कहा, “बैग तो मिला है सर, पर कॉपी नहीं।”
पूरे स्कूल में ऐसे बीस और बच्चे थे—जिन्हें सिर्फ दिखाने के लिए सामान मिला था। किताबें आने में देर थी, लेकिन फोटो खिंच चुके थे। सोशल मीडिया पर स्कूल का वीडियो वायरल हो गया था—“सरकारी शिक्षा में बदलाव।”
रात को रोहित ने अपनी बहन से कहा, “मुझे भी पढ़ना है, लेकिन खाली बैग से कैसे पढ़ूँ?”
बहन ने कहा, “बैग में सपने भर ले भाई, शायद कोई सुन ले।”
- बुढ़ापे की गुहार
रेलवे स्टेशन पर एक बूढ़ा आदमी अपने दस्तावेज़ लिए दौड़ता रहा। पेंशन के लिए प्रमाण-पत्र जमा करना था, पर कहीं अंगूठा लगता नहीं।
क्लर्क ने कहा, “सिस्टम डाउन है, कल आना।”
वह अगले दिन फिर आया। गर्मी थी, घुटनों में दर्द था, लेकिन आशा बाकी थी।
तीसरे दिन उसे बताया गया—“आपका नाम रिकॉर्ड में नहीं है। शायद किसी और के खाते में जुड़ गया।”
उसने पूछा, “तो मैं जिंदा हूँ या नहीं?”
कोई उत्तर नहीं। भीड़ गुजरती रही, मशीनें बजती रहीं, और वह आदमी फॉर्म हाथ में लिए सोचता रहा—क्या वृद्ध होना अब अपराध है?
बगल में बैठी एक महिला बोली, “पेंशन सिस्टम नहीं, आत्म-सम्मान की अंतिम किश्त होती है।”
- चमचमाती सड़कें
शहर में नई सड़कें बन रही थीं। हर गली में तारकोल बिछाया जा रहा था। विधायक जी ने फीता काटा, फोटो खिंचे।
बस्ती के बाहर रहने वाला रामू बोला, “हमारे मोहल्ले में कब बनेगी सड़क?”
किसी ने कहा, “तुम वोटर लिस्ट में नहीं हो शायद।”
रामू के मोहल्ले में आज भी बारिश में कीचड़ भर जाता है, बच्चा स्कूल नहीं जा पाता, और एम्बुलेंस लौट जाती है। पर नेता का भाषण यही कहता है—“विकास हर घर पहुँचा है।”
रामू के बेटे ने पूछा, “क्या हमारे घर की सड़क भी वोट से बनती है?”
रामू चुप था। लेकिन उसकी चुप्पी में एक ज्वालामुखी पल रहा था—जो अगले चुनाव में फूट सकता था।
- आखिरी ताला
एक सरकारी पुस्तकालय में आखिरी दिन था। नए बिल्डिंग प्लान में उसे “गैर-आवश्यक” घोषित किया गया था।
लाइब्रेरियन ने कहा, “पचास साल से यहाँ काम कर रहा हूँ, आज पहली बार किताबें रोती दिखीं।”
छात्रों ने मोमबत्तियाँ जलाकर विरोध किया, लेकिन आदेश जारी हो चुका था।
एक लड़की ने पूछा, “किताबें कहाँ जाएँगी?” अफसर ने कहा, “गोदाम में रखी जाएँगी, डिजिटल लाइब्रेरी आ रही है।”
लेकिन उस गाँव में बिजली दिन में तीन घंटे आती थी, और इंटरनेट तो सपना था।
आखिरी ताला लगाते वक्त लाइब्रेरियन ने फुसफुसाया, “किताबें बुझी नहीं हैं, हम ही अंधे हो गए हैं।”
- परखा गया इंसान
दफ्तर में इंटरव्यू चल रहा था। युवक ने B.Sc. किया था, पर हिंदी में बात करता था।
बोर्ड के सदस्य ने कहा, “आप इंग्लिश में जवाब क्यों नहीं दे रहे?”
युवक बोला, “क्योंकि मैंने विज्ञान पढ़ा है, भाषा की परीक्षा नहीं दी थी।”
बोर्ड मुस्कुराया। कहा, “पर कॉर्पोरेट को चालाक लोग चाहिए, सीधा बोलने वाले नहीं।”
युवक बाहर आ गया। माँ ने पूछा, “कैसा रहा?” उसने कहा, “मुझे नहीं चुना, मेरे आत्मसम्मान को परखा गया था।”
रात को उसी युवक ने अपने गाँव में विज्ञान की कक्षा शुरू की, और पहले दिन बीस बच्चे आए।
एक नया अध्याय शुरू हुआ था — जिसमें नौकरी हारने वाला शिक्षक नहीं, भविष्य गढ़ने वाला बना।
— डॉ. सत्यवान सौरभ
