लघुकथा – जूठी पत्तल
चुनावी दौर था ।धन्नु को नेताजी के फोन आते । नेताजी धन्नु को धनपत कहकर संबोधित करते उसके परिवार का हाल-चाल पूछते और चुनाव में विपक्ष की गतिविधियों की जानकारियां लेते तो वह मोबाइल पकड़े पकड़े ही जमीन पर उड़ने लगता। उसे लगता वही नेताजी का खास आदमी है। जैसे पार्टी उसके बूते ही चल रही है । वह कई बार अपनी पार्टी की वफादारी के लिए अपने ही लोगों से भिड़ जाता जो दूसरी पार्टी के समर्थक होते। पार्टी का खास वर्कर होने के नाते वह नेताजी को विपक्षी पार्टी की हर खबर भी पहुंचाता ।
चुनाव खत्म हुए और नेताजी जीत गए। बेचारा धन्नु अब फोन करता, परंतु नेता जी का फोन नहीं लगता । जैसे झूठी पत्तल को खाने के बाद फेंक देते हैं ,वैसे ही धनु का नाम भी नेता जी ने शायद कांटेक्ट लिस्ट से हटा दिया था और चुनावी दौर का धनपत फिर से धन्नु हो गया था।
— अशोक दर्द
