फ़िल्म समीक्षा : अतीत के पन्नों को पलटती – ‘द बंगाल फाइल्स’
“ताशकंद फाइल्स” और “कश्मीर फाइल्स” के बाद विवेक अग्निहोत्री ने बंगाल की फाइल्स ओपन की हैं। विवादास्पद इसमें कुछ भी नहीं हैं। भारती बैनर्जी के माध्यम से भारत छोड़ो आंदोलन के कालखंड से अब तक दर्द सह रही नारी का प्रतिबिम्ब बन वर्तमान परिप्रेक्ष्य को भी रेखांकित करती हैं।
कहानी – वर्तमान पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक दलित लड़की के गायब होने की तफ्तीश के लिए दिल्ली से सी.बी.आई. अफसर शिवा पंडित आता है। शक स्थानीय विधायक सरदार हुसैनी पर है। शिवा पर हमला होता है क्योंकि इलाके में पुलिस नहीं विधायक की चलती है। वो सीमा पार से अवैध लोगों को बसाता हैं।उन्हें यहां का नागरिक बना इलाके की डेमोग्राफी चेंज कर हिन्दू-मुसलमान बना रहा है। ताकि उसकी हुकूमत चलती रहे। तफ्तीश के दौरान शिवा को आज़ादी की लड़ाई लड़ चुकी भारती बैनर्जी मिलती है। जिसने अगस्त 1946 के बंगाल का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ देखा था।जिसमें हज़ारों लोग मारे गए थे, नोआखाली के दंगे देखे।आज भी बीते दिनों की उन भयानक यादों में वो खो जाती है। शिवा पाता है कि हालात आज भी कमोबेश वैसे ही हैं। हुक्मरान आज भी अपने स्वार्थ के लिए ‘वी द पीपल’ को इस्तेमाल कर रहे हैं।
निर्देशन, गीत-संगीत – विवेक अग्निहोत्री की राइटिंग और रिसर्च बढ़िया है, ये उनके मीडिया में आ रहे इंटरव्यूज़ से भी समझा जा सकता है। अतीत में हमारे कर्णधारों द्वारा की गईं भूलों को तथ्यों के साथ रेखांकित करती है। सवाल ये हैं कि वे रिसर्च इतनी अधिकता में की हैं वो दो फिल्मों में समा जाती। इसलिए भी फ़िल्म लंबी हो गई हैं। बेहतर होता है इसे दो पार्ट में बनाते और कहानी उस जगह छोड़ते जिससे दर्शकों में इंटरेस्ट पैदा होता। फिल्म कहीं-कहीं बोझिल होने लगती हैं, दर्शक इंतजार करता है कि फिल्म कब खत्म होगी। साथ ही कंफ्यूज भी होता रहता है कि फिल्म वर्तमान में है या अतीत में। निर्देशक ने कई सीन तो इतने प्रभावी बनाए हैं कि आप पलक झपकाना भी भूल जाते हैं। जैसे-महिलाओं को हैंगर से लटकाना, दो मोटरसाइकलों से सरदार बने अमर के दो टुकड़े हो जाना, जज की सरेआम बेईज्जती, नमाशी द्वारा बच्चे को गोली मारना व काकू की गर्दन काटना, हुसैनी द्वारा शिवा को बच्चे के सामने सॉरी बुलवाना, अमर व भारती का लाशों को ढोना, गिद्धों का लाशों पर मंडराना, पानी नहीं होने पर पसीना पीते हुए दिखाना और बच्चे का सड़क पे पड़ी रोटी खाना। ये दिखता है कि उनके निर्देशन में कितनी गहराई है। जिसे सिनेमाटोग्राफर अत्तर सिंह सैनी ने कैमरे में ज़बरदस्त कैद किया हैं। फ़िल्म के संगीतकार रोहित शर्मा ने संगीत अच्छा दिया हैं। क्लाइंमैक्स ज्यादा प्रभावी नहीं बन पाया हैं।
अभिनय – अफसरों की सुने या ईमानदारी से काम करे। इस कश्मकश में फसें एक सीबीआई अफसर के रोल में दर्शन कुमार ने इम्प्रेस किया है। गदर-2 के बाद सिमरत कौर रंधावा ने पल्लवी जोशी के जवानी वाले किरदार में कमाल किया हैं। उनके चेहरे के आते-जाते हाव-भाव और लंबे संवादों की निरंतरता काबिले तारीफ हैं। पल्लवी जोशी की चुप्पी कमाल हैं, वे आँखो से बहुत कुछ बोल जाती हैं। क्लायमेक्स में व्यथा बयां कर वे दर्शकों के आँसू निकलवा लेती हैं। अमर बने एकलव्य सूद ने एक सिख के किरदार में जान डाल दी हैं। अनुपम खेर ने महात्मा गांधी के रोल को बखूबी जिया हैं। हुसैनी बने शाश्वत चटर्जी और नमाशी चक्रवर्ती अपने किरदारों में जबरदस्त क्रूरता का परिचय देते हैं। मिथुन चक्रवर्ती का रोल छोटा होने के बावजूद वे प्रभावी रहें। राजेश खेरा, पुनीत इस्सर, प्रियांशु चटर्जी, सौरव दास ने भी उम्दा काम किया हैं।
खूबियाँ – कुछ कमियों को नजरअंदाज कर दिया जाए तो विवेक रंजन अग्निहोत्री ने एक बेहतरीन फिल्म पेश की है। उनका लेखन और निर्देशन असर छोड़ता है। थिएटर में जाकर ही आप इसका एक्सपीरिंयस कर सकते हैं। कलाकारों का दिल छूने वाला अभिनय इसका प्लस पॉइंट हैं। इसमें रियलिटी कूट-कूट कर भरी है, इसके लिए कला निर्देशक बधाई के पात्र हैं।
कमजोरी – इसकी तीन घंटे 24 मिनट की लम्बाई सबसे बड़ी बाधा हैं। एडिटर शंख राजाध्यक्ष लगभग 25 मिनट कम कर सकते थे। रियलिटी का डोज़ ओवरलोड हैं। साउथ की मूवीज के एक्शन दृश्य आराम से झेलनेवालों को कोई परेशानी नहीं होगी। कमजोर दिल वालों को यह फिल्म परेशान कर सकती है।
— संजय एम तराणेकर
