गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हैं रचे उपनिषद वह वरदान है हिंदी हमारी।
आन हिंदी बान हिंदी, शान है हिंदी हमारी।

आज रामायण पढ़ें मिलता हमें तो ज्ञान ही है।
जो अधर पर फैलती मुस्कान है हिंदी हमारी।

आज हिंदी है अब सजी यह देश के ही भाल पर जो।
हिंद के वासी हमीं पहचान यह हिंदी हमारी।।

आज पहुँचाएँ चलो मिलकर सभी ही नित्य घर – घर।
अब सुनो सोचो अभी अभियान है हिंदी हमारी।

सब गुणों की खान इसका व्याकरण देखो सरल है।
बन गयी चाहत आज हिंदुस्तान है हिंदी हमारी।।

सब समझ जाते इसे तो आज अपना ही बनाते।
है कथन ऋग्वेद का भी जान है हिंदी हमारी।।

यह अलंकारों व छंदों से सजी वंदन इसी का।
आज है समृद्ध यह उत्थान है हिंदी हमारी।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’