ऊँचे पेड़ों तले
वह नित सुबह शाम आती है
झाड़ू पौछा चौका की सफाई कर निकल जाती है
जाते समय अपनी साड़ी के पल्लू से हाथ पौंछते हुए
उसके चेहरे पर एक तृप्ति होती है
चलो एक घर तो निपटा
आगे उसे चार घरों की सफाई भी करनी है
उस समय वह एक योद्धा की तरह दिखती है
उसे जिस घर में जो मिला उसे जीत समझ
अपने साथ लाये थैले में सहेज रखे जाती है
वह दूर नेपाल से रोजी रोटी के लिये
अपने बालकों के उज्ज्वल भविष्य के लिये
दिल्ली शहर आई है
जैसे ऊँचे ऊँचे पेड़ों के तले
छोटी छोटी घांसे व अमरवेल उग आती हैं
वैसे ही वे बेचारी व चतुर नजर आती हैं
उसे अपने सात बच्चों का पालन पोषण करने के लिये
प्रात: एक यौद्धा बन जाना पड़ता है
शाम ढलने के साथ वह मातृत्व में बदलती जाती है
क्योंकि एक रात ही तो होती है
जब वह अपने बच्चों की जरूरतों को
जानते हुए उनसे खुलकर बतिया पाती है
कुछ वर्षों की मेहनत उपरांत उसके बच्चे
सामान्य वर्ग को हराकर कोटा पाकर
दिल्ली शहर के मजबूत पेड़ बन जाते हैं!
— संगीता कुमारी
