सर्द की धूप
सर्द की सुबह हल्की धूप
गुलाबी गालों सी दिखती है
शर्माया हुआ सूरज देर तक सोता है
शाम जल्दी ढल जाने पर भी
ना जाने क्यों ऐसा करता है
ओस की बूँदे घास के कपोलों पर
यूँ सजी होती हैं
जैसे नर्म गालों पर स्नान उपरांत
जल की बूँदे बिखरी रहती हैं
दिन ढलने के साथ हल्की गर्माहट
सूखे तौलिये की भांति
कपौल से ओस की बूँदे पौंछ देती है
प्रकृति में तरोताजगी की महक
बहकी बहकी हवाओं में घुलती है
लोगों को कमरों से बाहर धूप में
निकलने के लिये विवश कर देती है
सभी स्पर्श करना चाहते हैं
सर्द की गुलाबी हल्की धूप को!
— संगीता कुमारी
