सामाजिक

शायद बीस हज़ार, पच्चीस हजार, नहीं-नहीं तीस हजार तो पक्का

पता है पाठकों मैं बहुत कम समय टेलीविजन देखती हूॅं और अगर देखी भी तो सबसे अधिक समय मेरा विभिन्न चैनलों पर प्रसारित होने वाले खबरों पर ही नज़र जाती अर्थात न्यूज़ देखना मुझे ज्यादा पसंद है। अब आपको मेरी ये बात पता लगी तो आपके दिल में मेरे लिये एक नाम आ रहा होगा पंचायती लेखिका, हा हा हा हा पंचायती लेखिका वाह क्या नाम है। खुद लिखीं, खुद को ही पाठकों द्वारा दिये नाम का नामकरण किया और फिर खुद ही ठहाके मार-मार कर हंस रही अब मैं। बेहतरीन नाम जो खोजा आज खुद के लिये।

अरे-अरे चलो मज़ाक मस्ती छोड़ों, हॉं तो मैं आपको बता रही थी की मैं खबरें देखना बहुत पसंद करती हूॅं। ऐसा नहीं है कि मैं दूसरे मनोरंजन से भरे हुए चैनलों पर नजर नहीं घूमाती हूं? कभी-कभार में टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले सीरियल भी देख लेती हूॅं। मैं जो सीरियल देखती हूं वह हास्य मनोरंजन से भरे रहते हैं जैसे तारक मेहता का उल्टा चश्मा, कपिल शर्मा शो, मैडम सर जी और ऐसे बहुत से सीरियल है जिसमें भरपूर हास्य भरा हो। परंतु क्या आपको पता है इन हास्य सीरियलों के पीछे सीरियल बनाने का करण कभी-कभी समाज को एक सत्य से भरा हुआ आईना दिखाने का भी है। अर्थात कुछ सीरियल ऐसे होते हैं जो समाज को एक सिख दे जाते हैं चाहे वह सीरियल हास्य रूप में ही क्यों न बनाए गए हो परंतु हास्य के रूप में समाज को एक सकारात्मक संदेश जाए, इस बात का भी बहुत ख्याल रखा जाता है। किसी भी सीरियल को बनाने से पहले इसकी स्क्रिप्ट को बार-बार पढ़ा जाता है जहां शब्द परिवर्तन की जरूरत होती है वहां शब्द परिवर्तन भी किए जाते हैं ताकि स्क्रिप्ट द्वारा रचे गए किसी भी नाट्य रूपांतरण से किसी की भावना आहत नहीं हो। अर्थात बहुत ध्यान रखकर किसी सीरियल को बनाया जाता है की उसमें धर्म या किसी भी प्रकार के राजनीतिक मुद्दे को न उठाया जाए जो कि विवाद का रूप ले सके सीरियल पारिवारिक दृष्टि को मद्देनजर रखते हुए बनाए जाते हैं ताकि यदि एक परिवार साथ में मिलकर टेलीविजन पर किसी भी सीरियल को देखे तो उसमें किसी के दिल को चोट ना पहुंचे या बच्चे भी यदि साथ में देख रहे हो तो किसी भी प्रकार के आपत्तिजनक ऐसे प्रसंग को न रखें जो बच्चों पर गलत असर डाले या ऐसा कोई प्रसंग ना रखें जिसे माता-पिता सीरियल में बच्चों के सामने देखते हुए शर्मिंदगी महसूस करें कि उन्हें टेलीविजन बंद करने की जरूरत पड़ जाए। सच बहुत मेहनत का काम है एक स्क्रिप्ट लिख कर उसे नाट्य रूपांतरण देते-देते इतनी अर्थात पूरे देश की लोगों की भावनाओं का ध्यान रखना आसान काम नहीं है ये सब, हम तो बस घर बैठे मनोरंजन उठाते और कभी-कभी सीरियल में दस कमियां भी निकाल देते हैं। जरा मेरी तरह सोचिए.

अब आती हूॅं उस विषय पर जिस विषय पर आज एक हास्य धारावाहिक के जरिए कुछ ऐसी बात कही गई जो हजारों परिवार के लिए एक सीख तो है ही साथ ही हर एक गृहिणी को उसके आत्मसम्मान के प्रति जागरूक करने का एक जरिया भी है। दरअसल हास्य धारावाहिक मैडम सर जी के जरिए यह बताया गया कि कोई भी गृहणी किसी कमाऊं महिला से कम नहीं है। एक कमाऊं महिला और गृहणी का आंकलन किया जाए तो लगभग महिलाओं का पलड़ा एक तुल्य ही होगा। अब आप सोचेंगे ये भला कैसे हो सकता है? कमाऊं महिला कहॉं और एक गृहिणी कहॉं इन दोनों की बराबरी तो हो ही नहीं सकती। ऐसा नहीं है पाठकों धारावाहिक तो सिर्फ सीख देने के उद्देश्य से बनाया गया था असल जिंदगी में भी अगर आप प्रकाश डालते हुए अपने घर की चार दीवारी के भीतर झांकों तो मैं बिल्कुल सही बोल रही हूॅं। कामकाजी महिला और गृहणी एक तुल्य ही हैं। कैसे? तो चलो मैं बताती हूॅं आपको कि कैसे दोनों समान तुल्य हैं- कामकाजी महिला सुबह नौ-दस बजे काम पर जाती काम करती सैलरी मिलती, परंतु उस बीच वो घर को समय नहीं दे पाती अर्थात घर के काम के लिये हेल्पर रखती उसे पैसा दे देती। वही दूसरी ओर गृहणियां उस समय घर पर ही रहती वो घर का हर एक कार्य स्वयं करती जैसे भोजन तीन समय का बनाना, कपड़े धोना, बर्तन, बड़ों का ध्यान रखना, दवाई समय पर देना, बच्चों का ध्यान, पढ़ाई अन्य ना जाने छोटे-मोटे हर तरह के कार्य बस अंतर यह है कि गृहणी हैं यह सोचकर की ये सब हमारी जिम्मेदारी है मानकर कभी पगार नहीं लेती। ये एक गृहिणी का समर्पण है अपने परिवार के प्रति, परंतु आप कल्पना करें की यदि इन सब घर के कामों को जोड़कर इनकी आयु तय की जाए तो कोई हेल्पर समस्त काम का 25 से 30 हजार तो लेगी ही और साथ ही सप्ताह में एक या महीने में 2 छुट्टी तो लेगी ही जो तय रहती सभी हेल्पर की और उस छुट्टी के आप पैसे भी नहीं काट सकते, उपर से उसकी आव-भगत करना मतलब कोई चाय पिलाता, तो कोई गर्मागर्म रोटी-सब्जी देता कभी देर से आती तो कभी बहुत जल्दी ओर तो और आप उसे कुछ बोल तो दो आड़े हाथों आप को ही लेगी और करारा जवाब भी देगीद और सीधे बोल देगी नहीं पट रहा तो कोई दूसरी हेल्पर देख लो उफ्फ़ कितने नखरे सहने पड़ते इनके। अब आप सोचिये घर के भीतर एक गृहणी की कमाई कितनी हुई तीस हजार कम से कम और ऊपर से एक भी छुट्टी नहीं।

इतने विस्तार से समझाया एक घर में एक गृहिणी का योगदान, अब आप सोचिए घर में एक महिला का होना कितना जरूरी है। जो नसीब वाले हैं जिनके घर मे महिला है चाहे वह पत्नी के रूप में, बहन के रूप मे, भाभी या मॉं के रूप में हो महिला का होना कितना आवश्यक है ये एक अकेला रहने वाला पुरुष ही बता सकता है। परंतु फिर भी ये क्या? जो पुरूष अपने नसीब से घर में किसी ना किसी रूप में महिला पाए वही पुरूष उसे कम आंकते, उसे वह सम्मान नहीं देते जो एक कमाऊं महिला को देते ऐसा क्यों? यदि हर एक महिला कमाने लग जाएगी तो आज की पीढ़ी या आने वाली सात पीढ़ियों के बच्चों की कल्पना मात्र करके देखो, क्या वह स्वयं को उस जगह खड़ा कर पाएगी अर्थात ऊंचे मुकाम पर, ऊंचे मुकाम पर पहुंचाने मे एक गृहिणी का चाहे आर्थिक योगदान नहीं रहे परंतु समय-समय पर उनके हर एक पल का ख्याल रखने वाली गृहिणी ही है जो हर तरह से सहयोग करती बच्चों का फिर भी उसी को कम आंकते। मैं ऐसी बहुत सी महिलाओं को जानती जो कमाऊं तो हैं परंतु उसके साथ-साथ वह अनैतिक मार्ग ….. को भी अपना रही कुछ महिलाएं, परंतु फिर भी ऐसी महिलाएं पुरुषों को पसंद है गृहिणी की तुलना उनसे करते। अरे अपने गिरेबान में झांके ऐसे पुरूष और खुद से सवाल करें क्या वो इन सब कामों की हेल्पर का खर्चा वहन कर सकते हैं जो उनकी गृहिणी करती वो बाहर वाली कमाऊं औरतें जो उनको ज्यादा भाती उन्हें ही बुला लो फिर तो काम करने के लिये।

घर की औरतों की सैलरी तो देना शुरू करो जरा तब पता चलेगा की एक गृहिणी कितना कमाती घर रहते ही।

— डॉ. वीना तन्वी

वीना आडवाणी तन्वी

गृहिणी साझा पुस्तक..Parents our life Memory लाकडाऊन के सकारात्मक प्रभाव दर्द-ए शायरा अवार्ड महफिल के सितारे त्रिवेणी काव्य शायरा अवार्ड प्रादेशिक समाचार पत्र 2020 का व्दितीय अवार्ड सर्वश्रेष्ठ रचनाकार अवार्ड भारतीय अखिल साहित्यिक हिन्दी संस्था मे हो रही प्रतियोगिता मे लगातार सात बार प्रथम स्थान प्राप्त।। आदि कई उपलबधियों से सम्मानित