ग़ज़ल
इक उम्र तक ये काफी पशेमान हुआ है
अब जा के मेरे दिल को इत्मीनान हुआ है
अच्छा हुआ तू छोड़ के चला गया मुझे
अब थोड़ा मेरा अपनी तरफ ध्यान हुआ है
कुदरत ने हर उस शख्स को भरपूर सज़ा दी
जिस जिस को अपने आप पर गुमान हुआ है
तौबा, न करेंगे कभी हम इश्क दोबारा
इस कारोबार में बड़ा नुक्सान हुआ है
सींचा है अपने लहू से इक इक दरख़्त को
यूं ही नहीं ये सहरा गुलिस्तान हुआ है
— भरत मल्होत्रा
