हिंदी
अब
एक बूढ़ी किताब की तरह है-
जिसकी जिल्द उतर चुकी,
पर पन्नों में अब भी
धड़क है उस पहाड़ी दरख़्त की,
अपनापन है घर की हवेली-सा।
चूल्हे की राख में
सिंकी रोटी-सी हिंदी
आज भी पेट भरती है
भारतीय संस्कृति का।
हिंदीकृ
माँ के घिसे आँचल का कोना है,
जिससे आँखें पोंछकर
बच्चे अब भी मुस्कुराते हैं।
हिंदी गाँव की दहलीज़ पर बैठी
रास्ता तकती है
अपने शहर गए बेटों का।
रोज़ देहरी पर
नज़रें टिका कर
उदास हो जाती है
सोच में डूब जाती है,
कि उस साल
जब बच्चों के संग शहर गई थी,
तो कैसे सहम गई थी
पॉश कॉलोनियों की भाषा से।
शहर के दफ़्तरों,
लंबी गलियों,
और चकाचौंध में
चुप हिंदी
देख रही थी बेरुख़ी से
खुद का नज़रअंदाज़ होना।
कॉलेज के गेट पर
लोग उसे “देहाती” कहकर
दामन बचा रहे थे।
नज़रें नीची किए,
भीतर से टूटी हिंदी
मुँह में आँचल दबाए
रूलाई रोकने की
जुगत में थी।
सोच रही थी-
क्या कमी रह गई
दुलराने में उससे?
कहाँ चूक गई परवरिश मे
यह किस जहाँ के लोग हैं
जो माँ के नाम से
पहचाने जाने से
घबराते हैं?
— प्रदीप कुमार ओली
