वह कैसी औरतें थीं ?
वह कैसी औरतें थीं जो घर संभालती थीं…
जो सुबह की पहली किरण के साथ उठ जाती थीं,
परिवार की धड़कनों को अपने कदमों से ताल देती थीं।
उनकी आँखों में नींद नहीं, जिम्मेदारी का उजाला होता था।
वे सूरज से पहले जगतीं,
चाँद से बाद में सोतीं।
दिनभर की थकान के बाद भी चेहरे पर वही शांत मुस्कान..
जैसे सब कुछ पा लिया हो,
जबकि सब कुछ उन्होंने दे दिया होता था।
वह कैसी औरतें थीं ?
जो हर आहट में घर की धड़कन पहचानती थीं,
बच्चे की खाँसी,पति की थकान,
बुज़ुर्ग की चुप्पी…
सबकी भाषा समझती थीं।
वे बिना शब्दों के बोलती थीं,
बिना शिकवे के सुनती थीं,
और बिना पुरस्कार के
कर्म करती थीं।
वे चक्की पीसती थीं,
पर सिर्फ अनाज नहीं,
जीवन की लय भी पीसती थीं…
जिससे घर में रोटी के साथ सुख की सुगंध भी उठती थी।
उनके हाथ खुरदरे थे,
पर उन्हीं हथेलियों ने
हर आशीष की रेखा बनाई थी।
वे जब तुलसी को जल देती थीं,
तो लगता था जैसे पूरे घर में
श्रद्धा का संगीत बहने लगा हो।
वह कैसी औरतें थीं ?
जो त्योहारों की रौनक थीं,
पर खुद पर कभी रोशनी नहीं डालीं।
वे दीपक जलाती थीं,
पर अपना अंधेरा नहीं कहती थीं।
वे सजाती थीं दूसरों की थाली,
पर अपनी थकान का स्वाद
किसी ने नहीं जाना।
वे हँसती थीं…खिलखिलाकर,
पर उस हँसी के पीछे कितनी रातें जागकर काटी गई थीं,
किसी ने नहीं पूछा।
वे रसोई में गीत गुनगुनाती थीं,
और उसी गीत से घर की
दीवारें भी जीवंत हो उठती थीं।
वह कैसी औरतें थीं ?
जो दुनिया के बड़े निर्णयों में नहीं गिनी गईं,
पर हर छोटे निर्णय से
जीवन दिशा बदल जाती थी।
वे अर्थशास्त्र नहीं जानती थीं,
पर हर खर्च में संतुलन का पाठ पढ़ा जाती थीं।
वे राजनीति नहीं करती थीं,
पर घर का संविधान उन्हीं की हथेली पर टिका था।
कभी आँगन में बैठकर वे सुई-धागा चलाती थीं…
पर हर टांका मानो परिवार को जोड़े रखता था।
वे रिश्तों की दरारें सिलती थीं,
बिना किसी को बताए,
बिना किसी धन्यवाद की चाह रखे।
उनकी चुप्पी में भी वाणी थी,
उनकी विनम्रता में भी सामर्थ्य।
वह कैसी औरतें थीं ?
जो खुद को आख़िरी पायदान पर रखकर भी
सबको पहले स्थान पर देख
खुश हो जाती थीं।
जिन्होंने अपने सपनों को
दूसरों की नींद में समेट दिया,
और फिर भी किसी को एहसास नहीं होने दिया
कि उन्होंने क्या खोया,
क्या पाया।
वे साधारण नहीं थीं,
वे घर की आत्मा थीं।
हर दीवार में उनकी गूँज थी,
हर आशीर्वाद में उनका नाम,
हर सुबह की शुरुआत में
उनका श्रम,
और हर रात की शांति में
उनका धैर्य।
वे औरतें,
जिन्होंने इतिहास नहीं लिखा,
पर इतिहास बनाया।
जिनके नाम किसी किताब में नहीं,
पर हर घर के आँगन की मिट्टी में अंकित हैं।
उनके बिना घर सिर्फ ईंटों का
ढेर होता,
वे ही थीं जो ईंटों के बीच संवेदना की साँस भरती थीं।
वे नायिका नहीं थीं,
फिर भी हर युग की सबसे बड़ी नायिका वही थीं।
वह चुप थी, पर बोलती हर चीज़ उससे थी—
बच्चों की हँसी, घर का उजाला,
खुशबूदार रसोई, और समय पर तैयार रोटियाँ।
वह एक व्यक्ति नहीं थी,
वह पूरा युग थी
“नारी युग”—
जो चुपचाप जीवन का अर्थ
रचती रही।
वे औरतें अब भी हर घर की
नींव हैं,
हर पीढ़ी की प्रेरणा हैं,
और हर युग का अनकहा गीत
जो कोई लिखे या न लिखे,
समय स्वयं जिसकी गवाही देता रहेगा।
वह औरतें जो घर संभालती थीं
दरअसल, वही थीं
जो जीवन को अर्थ देती थीं।
— डॉ. निशा नंदिनी भारतीय
