हास्य व्यंग्य

यात्रीगण कृपया ध्यान दें!

“यात्रीगण कृपया ध्यान दें!” यह वाक्य सुनते ही दिमाग में तुरंत स्टेशन की तस्वीर उभर आती है — प्लेटफॉर्म पर भागते लोग, चाय की केतली की सीटी, ट्रेन के इंजन की गुर्राहट, और ऊपर से लाउडस्पीकर पर किसी मीठी मगर भावहीन आवाज़ में यह घोषणा। आज अहमदाबाद से वापी की यात्रा के दौरान वही आवाज़ फिर गूंजी — और मन में एक सवाल कौंध गया — आख़िर ध्यान देने का काम हमेशा यात्रीगण को ही क्यों सौंपा गया है?

ट्रेन में सफर करना हमारे देश में एक अनुभव नहीं, एक परंपरा है। यह अनुभव सिर्फ आम आदमी ही समझ सकता है। क्योंकि खास लोगों के लिए तो हवाई यात्रा है — जहाँ चाय, समाचार और सुरक्षा सब “इनबिल्ट” मिलती है। वहाँ किसी को यह कहने की ज़रूरत नहीं पड़ती कि “कृपया ध्यान दें” — क्योंकि ध्यान देने का ज़िम्मा एयरलाइंस का होता है।
पर ट्रेन में? यहाँ ध्यान देने का ठेका पूरा का पूरा यात्री के हिस्से में आता है!

रेलवे विभाग को भलीभांति पता है कि आम आदमी ही वो प्राणी है जो सब्ज़ी मंडी में टमाटर दो रुपए सस्ता ढूंढ लेता है, पानीपुरी के बाद सूखी पुरी मांगे बिना नहीं छोड़ता, और पंखे की गति से लेकर किराए के हिसाब तक सबका हिसाब रखता है। तो भला “ध्यान देने” की ज़िम्मेदारी और किसे दी जाए!

अब ट्रेन अगर दो घंटे लेट हो जाए — तो रेलवे की शहद-सी मीठी घोषणा फिर कानों में घुलती है — “यात्रीगण कृपया ध्यान दें, फलानी गाड़ी दो घंटे विलंब से आ रही है।” मतलब साफ़ है — अगर आप लेट हुए, तो ट्रेन छूट जाएगी। पर अगर ट्रेन लेट हो, तो बस “कृपया ध्यान दें।” इतनी सरल नीति शायद किसी और संस्था में नहीं मिलेगी।

अब बेचारा यात्री क्या करे? वो स्टेशन पर इधर-उधर घूमता है, कभी बेंच पर बैठता है, कभी चाय पीता है, और तभी फिर से वही आवाज़ आती है — “यात्रीगण कृपया ध्यान दें, किसी भी लावारिस वस्तु को देखते ही रेलवे को सूचना दें।” अब सवाल ये उठता है कि लावारिस वस्तु का ध्यान भी वही रखे, और जिन सामानों का वो वारिस है, उनका भी ध्यान वही रखे! वरना बैग से लेकर जूते तक, सब “लावारिस” घोषित हो सकते हैं।

किसी तरह ट्रेन में जगह मिल जाए तो समझो युद्ध जीत लिया। लेकिन जंग अभी बाकी है। क्योंकि ध्यान देने के काम अब और बढ़ जाते हैं। रेल नीर की बोतल पर 15 रुपए लिखा है,
पर 20 में बिकेगी — ध्यान दीजिए। पेंट्री का खाना गरम है या ठंडा, दाम में प्यार ज्यादा है या नमक — ध्यान दीजिए। बर्थ सही है या ऊपर-नीचे बदल गई — ध्यान दीजिए। और अगर ट्रेन की स्पीड कभी रेंगने लगे, तो अगला कार्यक्रम बिगड़ने से पहले — फिर से ध्यान दीजिए। रेल विभाग का काम सिर्फ टिकट काटने तक सीमित है। कन्फर्म हुआ या वेटिंग में अटका — वो आपकी किस्मत। कैंसल करें या सफर करें — दोनों सूरत में उनका मुनाफा पक्का है। बाकी ध्यान देना आपका धर्म है।

और सबसे प्यारा हिस्सा आता है गंतव्य पर पहुँचने से पहले — जब स्टेशन नज़दीक आता है, ट्रेन धीमी होती है, और फिर वही मधुर आवाज़ — “यात्रीगण कृपया अपने सामान का ध्यान रखें।” अब चाहे सामान हो या सम्मान — ध्यान हमेशा आपको ही देना है।

तो अगली बार जब आप रेलवे स्टेशन पर हों, और स्पीकर से वो परिचित आवाज़ गूंजे — “यात्रीगण कृपया ध्यान दें!” तो मुस्कुरा लीजिए, क्योंकि भारतीय रेल में ध्यान देने का सारा ठेका हम यात्रियों के नाम है। जितना ध्यान रेल यात्रा के दौरान रेलवे हम यात्रियों को रखने को कहता है उसका 1 प्रतिशत भी रेल विभाग भी रख ले तो फि कहना ही क्या ?

— प्रज्ञा पांडेय मनु

*प्रज्ञा पाण्डेय 'मनु'

वापी़, गुजरात