पुस्तक समीक्षा

दलाली का सुख : व्यवस्था की पतन गाथा

# रूपसिंह चन्देल

वीरेन्द्र परमार बहु-विधा रचनाकार हैं. उत्तर-पूर्व भारत पर अब तक उनकी अट्ठाइस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. कहना अतिशयोक्ति न होगा कि पूर्वोत्तर भारत पर उनका कार्य अभूतपूर्व है और वहां का इतिहास, पौराणिकता, समाज-संस्कार, परम्पराओं, लोककथाओं आदि को जिस प्रामाणिकता के साथ उन्होंने अपनी इन पुस्तकों में प्रस्तुत किया वह हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है. उनमें एक प्रखर आलोचक, शोधकर्ता, यात्रा-संस्मरणकार, नाटककार, व्यंग्य और डायरी लेखक भी उपस्थित है. अब तक उनकी दो डायरी पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, उनमें भी उनके व्यंग्यकार और व्यवस्था विरोधी उग्र लेखक के दर्शन होते हैं. हाल में उनका व्यंग्य उपन्यास ’दलाली का सुख’ प्रकाशित हुआ है. यह उनका पहला उपन्यास है. उपन्यास में उनके वही तेवर देखने को मिलते हैं जो हमने उनकी दोनों डायरियों में देखे थे. उपन्यास के केन्द्र में भ्रष्टाचार, नैतिक पतन, गर्हित राजनीति, लंपटताई आदि व्याख्यायित हैं.

उपन्यास की कहानी चम्पतपुर नामक महाद्वीप और उसके नौ राज्यों में बंटी हुई है. अंजू और राजाराम ऎसे पात्र हैं, जिनसे उपन्यास की कहानी का प्रारंभ होता है और अंत में भी दोनों पात्र प्रकट होते हैं. राजाराम एक ऎसे पात्र के रूप में चित्रित हुआ है जिसकी यौनाकांक्षा प्रबल है. सत्रह वर्ष की उम्र में कमला नामक एक ऎसी युवती के संपर्क में आकर वह अपनी यौन शुचिता खो देता है, जिसका पति कोलकाता में नौकरी करता है. वहीं से प्रारंभ होता है उसका चारित्रिक पतन. उसके पिता एक सरकारी कार्यालय में चपरासी हैं. वह झारग्राम से एम.ए. करने के बाद मदरसा विश्वविद्यालय में पी-एच.डी. के लिए जे.आर.एफ प्राप्त करने में सफल रहता है और आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो जाता है. मदरसा विश्वविद्याल में उसका परिचय डुमरी गांव की अंजू से होता है. वह अंजू को अपने प्रेम जाल में फंसाने में सफल रहता है. सुषमा, शांति, सुमन, अंजु, नंदिनी और अंत में परवीन सुल्ताना. यहां यह महत्वपूर्ण है कि इन नारी पात्रों के साथ यौन संबन्ध स्थापित करने की रुचि रखने के लिए राजाराम अकेले दोषी नहीं है. लेखक ने नारी पात्रों को भी उतना ही उत्सुक, उत्तेजित और भोग-विलास में डूबा चित्रित किया है. स्पष्टतया उपन्यास में आज की स्त्रियों में हुए चारित्रिक परिवर्तन को बेबाकी के साथ प्रस्तुत किया गया है. भले ही लेखक ने स्त्री-विमर्श या नारी-मुक्ति आन्दोलनों की चर्चा नहीं की, भले ही उपन्यास में नारीवादियों का उल्लेख नहीं है लेकिन उपन्यास के नारी पात्रों का खुलापन, उद्दाम यौनिकता और अपने काम के लिए निःसंकोच किसी भी हद तक जाने की बेधड़क चाहत आज के नारी जीवन में हो रहे परिवर्तन की व्याख्या करता दिखाई देता है. हालांकि यह स्थिति कुछ ही नारी पात्रों में देखने को मिलती है, खासकर जो पढ-लिख रही हैं और महानगरों के उन्मुक्त वातावरण का हिस्सा हैं. लेखक ने डुमरी गांव की कुछ महिलाओं के चारित्रिक पतन का भी वर्णन किया है जो अंजू और राजाराम के संबन्धों पर चोंचे लड़ाती हैं, जबकि उन्होंने अपनी जवानी में कितने ही पुरुषों के शिकार किए होते हैं. कबूतरी की चाची, जलेसर की बीवी, रमपतिया फुआ, सुनयना, कामुकप्रिया, जलेबी काकी आदि.

वीरेन्द्र परमार गांव से आए साहित्यकार हैं, इसलिए गांव के अनुभव भी गहनता के साथ उपन्यास में उद्घाटित हुए हैं.

’दलाली का सुख’ शीर्षक स्पष्ट करता है कि उपन्यास का केन्द्रीय विषय भ्रष्टाचार है. हर प्रकार का भ्रष्टाचार. प्रारंभिक दो अध्याय को उपन्यास की भूमिका मान सकते हैं, क्योंकि अंजू और राजाराम की कहानी अध्याय तीन से प्रारंभ होती है. भ्रष्टाचार पर जिस व्यंग्यात्मक भाषा में लेखक कटाक्ष करते हैं वह अप्रतिम है. कितने ही पात्रों और स्थानों के नाम सहज ही पहचाने जा सकते हैं. उदाहरण के लिए पोपटलाल और पुनीता देवी या परवीन सुल्ताना. परवीन सुल्ताना कवयित्री है और देह को माध्यम बनाकर वह कुछ भी हासिल कर लेती है. ऎसे और भी कितने ही नारी पात्र चित्रित हुए हैं. बालजाक ने कहा था कि वह एक पात्र के निर्माण के लिए चार-पांच पात्रों की विशेषताओं को एक खरल में डालकर खरल करता है उसके बाद जो पात्र तैयार होता है वह उसके उपन्यास का पात्र बनता है. मुजफ्फरपुर की परवीन सुल्ताना भी ऎसी ही पात्रा है. उपन्यास के अन्य अनेक पात्र भी, जिन्हें चित्रित करने से पहले लेखक परमार ने बालजाक की तरह खरल करके तैयार किया होगा.

संपूर्ण उपन्यास लेखक के असंतोष और विद्रोह से भरा हुआ है. “बड़े-बड़े लेखक और कवि पुरस्कार प्राप्त करने के लिए दलालों के चरण रज को माथे से लगाकर अपना जीवन धन्य बना रहे थे. वामपंथी छलशास्त्र और दलालपुराण को दक्षिणपंथियों ने भी अपना कंठहार बना लिया था. वामपंथियों और दक्षिणपंथियों दोनों के आंगन में भ्रष्टाचार की पतितपावनी निर्मल गंगा लहरा रही थी. वामपंथ और दक्षणपंथ के  बीच की दीवार ध्वस्त हो गयी थी और स्वार्थपंथ का कंगूरा शान से चमक रहा था. अनेक उभयलिंगी नरश्रेष्ठों ने रातोंरात अपने पाजामे और निक्करों के रंग बदल लिए थे.—-कुलपति के पद तीन करोड़ में बिक रहे थे.” (P-9) मदरसा विश्वविद्याल के बारे में लेखक का कथन दृष्टव्य है, “मदरसा विश्वविद्यालय को दलालपुर का गौरव समझा जाता था. गंगा-जमुनी तहजीब के सीमेंट और सेकुलर गारे से निर्मित इस विश्वविद्यालय में एक से बढकर एक छंटे हुए प्रोफेसर और जिन्दाबाद-मुर्दाबाद की दुकान चलाने वाले छात्र पढते थे. चंपतपुर के बुद्धिजीवी हरा कुर्ता और लाल पाजामा पहनते थे. वे अपने पाजामे में समाजवादी नाड़ा डालते थे.” (17)

दलालपुर चंपतपुर की राजधानी है.

उपन्यास में इतने अधिक विस्फोटक उद्धरण हैं कि पढ़ते समय लगभग आधी पुस्तक रंग गयी. यद्यपि राजाराम उपन्यास में आद्यंत विद्यमान रहता है और उसके माध्यम से चंपतपुर की पतनगाथा उद्घाटित होती चलती है, लेकिन बीच-बीच में चंपतपुर महाद्वीप के दूसरे राज्यों, वहां की स्थितियों, विश्वविद्यालयों के प्रोफेसरों और कुलपतियों की काली कारगुजारी का कच्चा चिट्ठा उजागर होता चलता है. “चंपतपुर की शिक्षा व्यवस्था रिश्वत और रंडीबाजी के सहारे फल-फूल रही थी. रिश्वतखोरी को वैध बना दिया गया था और हर पद के लिए रिश्वत की दर निश्चित कर दी गई थी. कुलपति के पद पांच करोड़, सहायक प्रोपेसर के पद बीस लाख, स्कूल शिक्षक के पद पांच लाख में बिक रहे थे.  रिश्वतखोरी के धंधे में पूर्ण ईमानदारी थी. सातवीं पास शिक्षा मंत्री चैन की वंशी बजा रहे थे. जो चपरासी नहीं बन सकता था  वह प्रोफेसर बनकर छात्रों के ज्ञान का विस्तार कर रहा था. संपूर्ण चंपतपुर बेईमानी की चादर ओढ़कर सोया हुआ हा.––चंपतपुर महाद्वीप के विश्वविद्यालय जड़ता, कूपमंडूकता, पुरातनपंथ और पिष्टपेषणा से बुरी तरह ग्रस्त थे.—–इनकी अधिकांश ऊर्जा हिन्दी के लिए विधवा विलाप करने में ही स्वाहा हो जाती थी.” (67)

लेखक ने डुमरी ग्राम के पंचायत चुनाव के माध्यम से चुनावी राजनीति में व्याप्त भ्रष्टचार का वास्तविक चित्रण किया है. दो बार से राजपूत बहुल गांव का ग्राम प्रधान तजमुल हुसैन था. तीसरी बार भी वह चुनाव लड़ रहा था. अंजू के साथ गांव आने पर राजाराम को उसके पिता रज्जन सिंह ग्राम-प्रधान का चुनाव देखकर जाने के लिए रोक लेते हैं. तीसरी बार गांव के कई राजपूत चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन तजमुल हुसैन ने दो बार में इतना धन कमाया था कि वह चिकन और शराब के बल पर कुछ युवा राजपूतों को अपने पक्ष में चुनाव लड़ रहे राजपूतों को नाम वापस लेने के लिए समझाने का काम सौंपता है. उसे सफलता मिलती है. जो नाम वापस लेने के लिए अड़ा रहता है उसे पचास हजार में वह खरीद लेता है. डुमरी गांव के ग्राम प्रधान का चुनाव चंपतपुर की राष्ट्रीय राजनीति की वास्तविक स्थिति को प्रत्यक्षरूप से प्रकट करता है.

’दलाली का सुख’ निश्चित ही व्यंग्य उपन्यास विधा में एक सशक्त कृति के रूप में स्वीकार किया जाएगा. वीरेन्द्र परमार के पास व्यंग्य के लिए उपयुक्त तीक्ष्ण भाषा-शिल्प है और कथानक में उल्लेखनीय गतिशीलता है. गतिशीलता किसी भी रचना की लोकप्रियता का प्रमुख आधार होती है. सुखद बात यह कि परमार जी के पास गांव, नगर, महानगर के गहन अनुभव हैं. देश के विभिन्न शहरों तथा विदेश के अनेक देशों का उन्होंने भ्रमण किया है. भ्रमण किसी भी लेखक के लेखकीय अवदान को गंभीर और सशक्तता प्रदान करता है. परमार बहुत ही अध्ययनशील लेखक हैं. एक अच्छे और सफल लेखक के लिए आवश्यक है कि वह देश-विदेश के लेखकों का अध्ययन करे. विश्व के सभी महान लेखकों ने अपने पूर्व और समकालीन देश-विदेश के लेखकों का गहन अध्ययन किया और महान रचनाओं को जन्म दिया. वीरेन्द्र जी उनके पद-चिन्हों पर चलनेवाले लेखक हैं. पूर्वोत्तर भारत पर उनकी पुस्तकें उनके गहन अध्ययन, भ्रमण, अनुभव और अध्यवसाय का ही परिणाम हैं.

मुझे पूरा विश्वास है कि शीघ्र ही पाठकों को उनका दूसरा उपन्यास पढ़ने को मिलेगा. मैं व्यंग्य उपन्यास नहीं कह रहा, क्योंकि उसमें लेखन की सीमा तय हो जाती है, ऎसा मेरा मानना है. बहरहाल, यह वीरेन्द्र परमार जी को तय करना है.

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’दलाली का सुख’ – वीरेन्द्र परमार

श्रीसाहित्य प्रकाशन, दिल्ली,

पृ. 148, मूल्य -400/- (हार्ड बाउण्ड)

                              समीक्षक का पता                

रूपसिंह चन्देल

फ्लैट नं.403, टॉवर-2, विपुल गार्डेन, धारूहेड़ा-123106, हरियाणा

मो. नं.8059948233        

*वीरेन्द्र परमार

जन्म स्थान:- ग्राम+पोस्ट-जयमल डुमरी, जिला:- मुजफ्फरपुर(बिहार) -843107, जन्मतिथि:-10 मार्च 1962, शिक्षा:- एम.ए. (हिंदी),बी.एड.,नेट(यूजीसी),पीएच.डी., पूर्वोत्तर भारत के सामाजिक,सांस्कृतिक, भाषिक,साहित्यिक पक्षों,राजभाषा,राष्ट्रभाषा,लोकसाहित्य आदि विषयों पर गंभीर लेखन, प्रकाशित पुस्तकें :1.अरुणाचल का लोकजीवन 2.अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य 3.हिंदी सेवी संस्था कोश 4.राजभाषा विमर्श 5.कथाकार आचार्य शिवपूजन सहाय 6.हिंदी : राजभाषा, जनभाषा,विश्वभाषा 7.पूर्वोत्तर भारत : अतुल्य भारत 8.असम : लोकजीवन और संस्कृति 9.मेघालय : लोकजीवन और संस्कृति 10.त्रिपुरा : लोकजीवन और संस्कृति 11.नागालैंड : लोकजीवन और संस्कृति 12.पूर्वोत्तर भारत की नागा और कुकी–चीन जनजातियाँ 13.उत्तर–पूर्वी भारत के आदिवासी 14.पूर्वोत्तर भारत के पर्व–त्योहार 15.पूर्वोत्तर भारत के सांस्कृतिक आयाम 16.यतो अधर्मः ततो जयः (व्यंग्य संग्रह) 17.मणिपुर : भारत का मणिमुकुट 18.उत्तर-पूर्वी भारत का लोक साहित्य 19.अरुणाचल प्रदेश : लोकजीवन और संस्कृति 20.असम : आदिवासी और लोक साहित्य 21.मिजोरम : आदिवासी और लोक साहित्य 22.पूर्वोत्तर भारत : धर्म और संस्कृति 23.पूर्वोत्तर भारत कोश (तीन खंड) 24.आदिवासी संस्कृति 25.समय होत बलवान (डायरी) 26.समय समर्थ गुरु (डायरी) 27.सिक्किम : लोकजीवन और संस्कृति 28.फूलों का देश नीदरलैंड (यात्रा संस्मरण) I मोबाइल-9868200085, ईमेल:- bkscgwb@gmail.com