भगवान धन्वंतरि,की दिव्य परंपरा आज भी प्रत्येक वैद्य और चिकित्सक को प्रेरित करती है
भारतीय संस्कृति में जब भी स्वास्थ्य, औषधि और जीवन-संरक्षण की चर्चा होती है, वहाँ भगवान धन्वंतरी का नाम आदरपूर्वक लिया जाता है। समुद्र मंथन के समय जब देवता और दानव अमृत की खोज में संलग्न थे, तब सागर की उदरगर्भा से एक दिव्य पुरुष प्रकट हुए जिनके करकमलों में अमृत कलश था ,यही भगवान धन्वंतरी थे। उन्हें आयुर्वेद का जनक, देव वैद्य और सम्पूर्ण चिकित्साशास्त्र का अधिष्ठाता माना गया है।वे दिव्य रूप में भगवान विष्णु के अवतार हैं और आयुर्वेद शास्त्र का मूल सूत्र उनके द्वारा ही प्रदान किया गया। चरक संहिता, सुश्रुत संहिता और अन्य आयुर्वेदिक ग्रंथों का आद्य ज्ञान उन्हीं के मानस से प्रवाहित हुआ। सुश्रुत जैसे महर्षि ने चिकित्सा और शल्यकर्म का जो विज्ञान विकसित किया, उसका मूल स्रोत भी धन्वंतरी परंपरा ही है। इसीलिए उन्हें चिकित्सकों का गुरु, स्वास्थ्य का संरक्षक और जीवन-संतुलन का देवता कहा जाता है।धन्वंतरी जयंती का पर्व कार्तिक मास की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है, जिसे धनतेरस भी कहा जाता है। इस दिन आयुर्वेदाचार्य, वैद्य, चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी भगवान धन्वंतरी की प्रतिमा की पूजा करते हैं और आरोग्य, दीर्घायु तथा रोग-मुक्त समाज की कामना करते हैं। यह दिन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और आयुर्वेद के पुनरुत्थान का प्रतीक भी है।भगवान धन्वंतरी की उपासना का वास्तविक अर्थ केवल मंत्रोच्चारण या दीपाराधना नहीं, बल्कि स्वास्थ्य को धर्म का उपांग समझने की चेतना है। आयुर्वेद कहता है — “सुदीर्घं जीवितं एव मनुष्यस्य परमं लक्ष्यं” अर्थात दीर्घ और स्वस्थ जीवन ही परम लक्ष्य है। जब समाज अपने शरीर, मन और पर्यावरण के संतुलन को समझता है, तभी धन्वंतरी का आशीर्वाद साकार होता है।आज जब आधुनिक चिकित्सा और वैकल्पिक उपचार प्रणालियाँ साथ-साथ चल रही हैं, तब भगवान धन्वंतरी के सिद्धांत पहले से अधिक प्रासंगिक हैं,प्राकृतिक आहार, समय-संतुलित जीवन, औषधियों में विश्वास और करुणामय उपचार। इसी मार्ग से चिकित्सा केवल उपचार नहीं, बल्कि साधना बन जाती है।भगवान धन्वंतरी की जयंती हमें यह स्मरण कराती है कि एक चिकित्सक केवल शरीर का वैद्य नहीं होता, वह प्राणों का संरक्षक और समाज का हितकारी भी होता है। धन्वंतरी की दिव्य परंपरा आज भी प्रत्येक वैद्य और चिकित्सक को प्रेरित करती है कि वे सेवा, सहानुभूति और ज्ञान के संगम से जनकल्याण का पथ प्रशस्त करें।
— डॉ मुश्ताक अहमद शाह.
