माँ!
जिसके आगे बौना सा बेबश है अनंत आकाश।
जिसके आगे मद्धिम सा है इंद्रधनुष व सूर्य प्रकाश!!
बीत गए हैं कई वर्ष वैसे मेरी माँ को गुजरे!
पर विश्वास नहीं होता है!
कल परसों की बात हो जैसे!!
अब भी वैसी ही दिखती है, जैसे छोड़ गई थी मुझको!!
मेरी आँखों मे जिंदा उसकी चितवन दिख सकती तुमको!!
मेरी आँखों मे अब भी वो झील सी ऑंखें बसी हुई हैं!
निरख रहीं दिनरैन मुझे जो कब से ऑंखें जगी हुई हैं!!
माँ की दृष्टि अभेद्य कवच है, सुख दुःख में समान संबल है!
कैसी भी विपदा आ जाये माँ कमजोर न हो सकती है!!
निज जीवन की चिंता तजकर रार काल से कर सकती हैं!
हँसते हँसते जो पहाड़ के जैसे कष्ट भी सह सकती है!!
माँ धरती सी है इस जग में जगती का आधार वही है!
बाप हिमालय है जग में तो, माँ बस गंगा हो सकती है!!
पाप तुम्हारे धोते धोते खुद ही मैली हो सकती है!
बच्चे भले बिमुख हो जाएं पर माँ बिमुख न हो सकती है!!
— गणेश दत्त गौतम
