नई सदी का सूरज
मैं जागता रहा
देखता रह खुली आंखों से सपने
बोता रहा आकाश में
अपना उज्ज्वल भविष्य…
तिनका – तिनका जोड़ता रहा
हौसलों के पंख लगाकर
उड़ान भरता रहा
मैं जागता रहा ।
सागर तल में उतरा
मोतियों की तलाश में
समय की शिला पर लिखा
मैं बदल न सका
अब लगाता हूं हिसाब
कितना सार्थक हुआ मेरा श्रम ।
मैं जागता रहा
देखता रहा खुली आंखों से सपने
मेरे गवाह हैं
वो टूटे-फूटे दुर्गम रास्ते
जिन पर मैं निरंतर चला
और दुनिया की हंसी सहता रहा
जमाने भर का गरल पीता रहा
मैं अपने भीतर
नई सदी का सूरज उगाता रहा।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
